अमृतसर। बेअदबी कानून में संशोधन की प्रक्रिया को लेकर पंजाब सरकार और सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था श्री अकाल तख्त साहिब के बीच विवाद गहरा गया है। अकाल तख्त के जत्थेदार कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने सरकार द्वारा भेजी गई रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया है। जत्थेदार ने स्पष्ट किया कि सरकार ने अकाल तख्त द्वारा दिए गए सुझावों को गंभीरता से नहीं लिया है। उनके अनुसार, संशोधित मसौदे में केवल 10 प्रतिशत बदलाव किए गए हैं, जबकि 90 प्रतिशत मूल सुझावों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। जत्थेदार ने सरकार के इस रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई है।
निगरानी धाराओं पर अकाल तख्त की कड़ी आपत्ति
जत्थेदार कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने वीरवार को सचिवालय में मीडिया से बात करते हुए बताया कि सरकार ने 2008 और 2021 के अधिनियमों में शामिल ‘निगरानी’ (Surveillance) धाराओं को नहीं हटाया है। अकाल तख्त की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इन धाराओं के माध्यम से सरकार को यह तय करने का अधिकार मिल जाता है कि पवित्र स्वरूपों को कौन रख सकता है और कौन छाप सकता है। जत्थेदार का तर्क है कि पवित्र ग्रंथों के प्रबंधन और मर्यादा का अधिकार केवल श्री अकाल तख्त साहिब और खालसा पंथ के पास होना चाहिए, न कि सरकार के पास। सरकार की भूमिका केवल अपराधियों को गिरफ्तार करने और उन्हें कड़ी सजा दिलाने तक सीमित रहनी चाहिए।
बैठक में बनी सहमति के उल्लंघन का आरोप
ज्ञानी गड़गज्ज ने याद दिलाया कि 29 जून को पंजाब सरकार के मंत्रियों और विधायकों के साथ हुई बैठक में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सहमति बनी थी। उस समय पांच सिंह साहिबान की मौजूदगी में सभी राजनीतिक दलों के सिख प्रतिनिधियों ने हाथ उठाकर वादा किया था कि निगरानी संबंधी धाराएं हटाई जाएंगी। हालांकि, 29 जुलाई को सौंपे गए नए मसौदे में इन वादों का पालन नहीं किया गया। जत्थेदार ने आरोप लगाया कि सरकार ने ‘निगरानी’ शब्द की लंबी कानूनी व्याख्या देकर मूल मुद्दे को भटकाने की कोशिश की है। उन्होंने सरकार द्वारा गुप्त कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेने पर भी सवाल उठाए।
विशेषज्ञ समिति का गठन और दो महीने का अल्टीमेटम
अकाल तख्त ने अब इस मामले को सुलझाने के लिए एक पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति की घोषणा की है। इस समिति में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति रुपिंदर सिंह सोढ़ी, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति महेंद्र मोहन बेदी, वरिष्ठ अधिवक्ता पूर्ण सिंह हुंदल, केहर सिंह और प्रो. जगमोहन सिंह टोनी को शामिल किया गया है। लखबीर सिंह को इस समिति का समन्वयक बनाया गया है। जत्थेदार ने पंजाब सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि अगले दो महीनों के भीतर कानून से सभी आपत्तिजनक प्रावधान नहीं हटाए गए, तो अकाल तख्त इस मुद्दे पर कोई कठोर फैसला लेने के लिए बाध्य होगा। उन्होंने सरकार को समिति के साथ बैठकर चर्चा करने का सुझाव भी दिया।
बेअदबी मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग
जत्थेदार ने बरगाड़ी जैसे पुराने बेअदबी मामलों का जिक्र करते हुए न्याय में हो रही देरी पर दुख जताया। उन्होंने मांग की कि बेअदबी के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित की जाएं। साथ ही, उन्होंने एक ऐसा कानून बनाने पर जोर दिया जिससे सिखों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले डेरों या संगठनों के प्रमुखों को भी सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराया जा सके। उन्होंने सरकार को सलाह दी कि वे धार्मिक संस्थाओं के साथ खुला संवाद स्थापित करें ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के टकराव की स्थिति पैदा न हो।
राजनीतिक कलह और अन्य सामाजिक मुद्दे
प्रेस वार्ता के दौरान जत्थेदार ने मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन लोगों को पंथ ‘गुरु-द्रोही’ घोषित कर चुका है, उन्हें स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि आम आदमी पार्टी के विधायक कुंवर विजय प्रताप सिंह ने उनसे संपर्क कर अपनी नाराजगी जाहिर की है। विधायक का आरोप है कि सरकार ने केवल चुनाव के समय उनका उपयोग किया और अब उनकी बात नहीं सुनी जा रही। इसके अतिरिक्त, जत्थेदार ने पंजाब में बढ़ते नशे, अमृतसर की सफाई व्यवस्था और गुटका साहिब के सम्मानजनक प्रबंधन जैसे मुद्दों पर भी सरकार को गंभीरता से काम करने की नसीहत दी। अब सबकी नजरें 3 अगस्त को होने वाली विधायी प्रक्रिया पर टिकी हैं।