कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया और दिलचस्प मोड़ देखने को मिल रहा है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने अपनी पूर्व नेता और वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कोलकाता में आयोजित होने वाले शहीद दिवस कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण भेजा है। यद्यपि यह न्योता सुनने में एक सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार लग सकता है, लेकिन कांग्रेस ने इसके साथ एक ऐसी कड़ी शर्त जोड़ दी है जिसने राज्य के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस का कहना है कि ममता बनर्जी इस कार्यक्रम में तभी शिरकत करें जब वह सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करें कि लगभग तीन दशक पहले कांग्रेस पार्टी छोड़ना उनकी एक बड़ी राजनीतिक भूल थी।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने शहीद मीनार परिसर में संवाददाताओं से बातचीत करते हुए इस निमंत्रण की शर्तों को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि 21 जुलाई 1993 का आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि यूथ कांग्रेस के झंडे तले लड़ा गया एक ऐतिहासिक संघर्ष था। शुभंकर सरकार ने ममता बनर्जी को नसीहत देते हुए कहा कि उन्हें इस दिन के महत्व को समझना चाहिए और इसके इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिए। उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा कि यदि ममता बनर्जी में सच में राजनीतिक साहस है, तो उन्हें इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करना बंद करना चाहिए और खुले मन से अपनी पुरानी गलती मान लेनी चाहिए।
कांग्रेस के इस रुख से यह साफ हो गया है कि वह ममता बनर्जी को उनके राजनीतिक अतीत की याद दिलाकर उन्हें कटघरे में खड़ा करना चाहती है। शुभंकर सरकार ने जोर देकर कहा कि जो नेता अपने राजनीतिक मूल और अतीत का सम्मान करता है, समाज में उसे ही अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। उनके अनुसार, ममता बनर्जी का शहीद मीनार के मंच पर आना और अपनी गलती स्वीकार करना एक प्रकार का ‘राजनीतिक प्रायश्चित’ होगा। कांग्रेस का मानना है कि इस कदम से न केवल इतिहास की गलतियों में सुधार होगा, बल्कि यह शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस का मंच सभी के लिए सदैव खुला है, लेकिन वहां आने के लिए सत्य और वैचारिक स्पष्टता आवश्यक है।
यह पूरा विवाद 21 जुलाई 1993 की उस घटना से जुड़ा है, जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में यूथ कांग्रेस ने एक विशाल रैली निकाली थी। उस दौरान हुई पुलिस कार्रवाई और गोलीबारी में 13 कार्यकर्ताओं की जान चली गई थी। इसके कुछ वर्षों बाद 1997 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का गठन कर लिया था। पार्टी बदलने के बावजूद ममता बनर्जी पिछले कई वर्षों से इस दिन को बड़े स्तर पर मनाती आ रही हैं और इसे अपनी पार्टी की पहचान से जोड़ती रही हैं। कांग्रेस अब इसी दावे को चुनौती दे रही है और आंदोलन की विरासत पर अपना हक जता रही है। इस निमंत्रण ने अब टीएमसी और कांग्रेस के बीच वैचारिक लड़ाई को एक नया रूप दे दिया है।
21 जुलाई 1993 का ऐतिहासिक घटनाक्रम
पश्चिम बंगाल के इतिहास में 21 जुलाई 1993 की तारीख एक अमिट अध्याय की तरह दर्ज है। उस समय ममता बनर्जी यूथ कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष थीं और उन्होंने वामपंथी सरकार के विरुद्ध ‘नो वोटर कार्ड, नो वोट’ के नारे के साथ कोलकाता की सड़कों पर मोर्चा खोला था। सचिवालय घेराव के इस प्रयास के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया और गोलियां चलाईं, जिसमें 13 कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौत हो गई थी। ममता बनर्जी ने भले ही बाद में नई पार्टी बना ली, लेकिन उन्होंने इन शहीदों की याद में हर साल ‘शहीद दिवस’ मनाने की परंपरा जारी रखी। अब कांग्रेस इसी विरासत को लेकर ममता बनर्जी से राजनीतिक स्पष्टीकरण और प्रायश्चित की मांग कर रही है।
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