तेहरान। पश्चिम एशिया में पिछले चार महीनों से जारी तनाव ने अब एक विनाशकारी मोड़ ले लिया है। अमेरिका और ईरान के बीच हुआ 60 दिनों का संघर्ष विराम समझौता महज दो हफ्तों के भीतर ही पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। इस समझौते के टूटने के साथ ही खाड़ी क्षेत्र एक बार फिर भीषण युद्ध की आग में झुलसने लगा है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अमेरिका ने ईरान पर सीधे हमले शुरू कर दिए हैं, वहीं जवाब में ईरान ने पड़ोसी मुल्क कुवैत पर मिसाइलों और ड्रोनों की बरसात कर दी है।
इस संघर्ष की सबसे बड़ी मार ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ी है। समझौते के तहत अमेरिका ने तेहरान को खुले बाजार में तेल बेचने की जो महत्वपूर्ण छूट दी थी, उसे अब तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि ईरान अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर में तेल का व्यापार नहीं कर सकेगा, जिससे उसकी आर्थिक कमर टूटना तय माना जा रहा है।
रणक्षेत्र बना कुवैत और गूंजते सायरन
ताजा सैन्य गतिविधियों के अनुसार, अमेरिकी बमबारी के प्रतिशोध में ईरान ने कुवैत को निशाना बनाया है। कुवैती सेना ने पुष्टि की है कि उसके क्षेत्र में दुश्मन की ओर से कई मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए हैं। देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पूरे कुवैत में ‘एयर रेड सायरन’ बजाकर नागरिकों को सचेत किया गया है। सरकारी समाचार एजेंसी ‘कुना’ ने बताया कि राजधानी सहित कई इलाकों में धमाकों की आवाजें सुनी गई हैं। हालांकि, कुवैती मिलिट्री का दावा है कि उनके हवाई रक्षा तंत्र ने अधिकांश खतरों को आसमान में ही नष्ट कर दिया है, जिससे जान-माल का बड़ा नुकसान टल गया।
क्यों टूटा ‘इस्लाबाद समझौता’?
विवाद की असली जड़ 18 जून को हुआ ‘इस्लाबाद समझौता’ था, जिसका उद्देश्य व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित मार्ग देना था। लेकिन मंगलवार को ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में सऊदी अरब और कतर के तीन बड़े तेल टैंकरों पर हमला कर दिया। इस हमले के बाद ओमान के तट के पास एक एलएनजी टैंकर धू-धू कर जल उठा। ईरान का तर्क है कि इन जहाजों ने उसकी चेतावनियों को नजरअंदाज किया था, जबकि अमेरिका इसे समझौते का खुला उल्लंघन मान रहा है।
आर्थिक प्रतिबंधों का नया शिकंजा
सैन्य कार्रवाई के साथ ही अमेरिका ने ‘जनरल लाइसेंस X1’ नामक नया नियम लागू कर दिया है। इसके तहत ईरान अब किसी भी देश के साथ तेल का नया सौदा नहीं कर पाएगा। जो सौदे पहले से चल रहे हैं, उन्हें पूरा करने के लिए केवल 17 जुलाई तक की मोहलत दी गई है। साथ ही, इन सौदों से प्राप्त होने वाली राशि को भी एक ‘फ्रीज अकाउंट’ में रखा जाएगा, जिसे ईरान इस्तेमाल नहीं कर सकेगा।
दुनिया पर संकट के बादल
ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गारीबाबादी ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के इस उल्लंघन के गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इस युद्ध का असर वैश्विक बाजार पर भी दिखना शुरू हो गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक उछल गई हैं। ब्रेंट क्रूड 75 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि दुनिया का 20 प्रतिशत तेल ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ से होकर गुजरता है, इसलिए इस मार्ग के असुरक्षित होने से पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहरा सकता है।
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