कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय अपने सबसे बड़े ऐतिहासिक संकट और उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर काफी समय से सुलग रही असंतोष की आग अब एक बड़े सियासी विस्फोट का रूप ले चुकी है। पार्टी के विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, टीएमसी अब सीधे तौर पर दो फाड़ होने की कगार पर खड़ी है। इस बगावत ने न केवल ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि राज्य के राजनीतिक समीकरणों को भी पूरी तरह बदल कर रख दिया है।
राजनीतिक गलियारों में हलचल उस समय और तेज हो गई जब बागी सांसदों की सूची में कई दिग्गज और लोकप्रिय चेहरों के नाम सामने आए। सूत्रों के मुताबिक, बागी खेमे में ममता बनर्जी की करीबी मानी जाने वाली जादवपुर की सांसद सायनी घोष, आसनसोल के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा और बहरामपुर से सांसद यूसुफ पठान जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इसके अलावा बारासात की सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में एक अलग गुट तैयार हो रहा है, जिसे करीब 22 सांसदों का समर्थन प्राप्त होने की संभावना है।
बागी होने वाले सांसदों की कथित सूची में राज्य के अलग-अलग हिस्सों के प्रभावी नेता शामिल हैं। इनमें जंगीपुर के खलीलुर रहमान, मुर्शिदाबाद के अबू ताहिर खान, बैरकपुर के पार्थ भौमिक, मथुरापुर के बापी हलदार और कोलकाता दक्षिण की सांसद माला रॉय के नाम भी चर्चा में हैं। इसके अतिरिक्त फिल्म जगत से राजनीति में आए देव (घाटाल), जून मालिया (मेदिनीपुर) और रचना बनर्जी (हुगली) जैसे सितारों के भी बागी रुख अपनाने की खबरें हैं। कूचबिहार, आरामबाग, झाड़ग्राम, बांकुरा, बोलपुर और बीरभूम जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के सांसद भी इस विद्रोही गुट का हिस्सा बताए जा रहे हैं।
पार्टी के भीतर यह संकट केवल लोकसभा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि राज्यसभा और विधानसभा में भी तृणमूल की नींव हिलती दिख रही है। हाल ही में राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी और सदन की सदस्यता से इस्तीफा देकर इस बगावत को और हवा दी है। वहीं, विधानसभा के भीतर स्थिति और भी विकट है। विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि ममता बनर्जी के खिलाफ जाने वाले विधायकों की संख्या अब बढ़कर 64 हो गई है और यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि बागी गुट ही ‘असली तृणमूल’ है और उनका किसी दूसरी पार्टी में विलय का कोई इरादा नहीं है।
पार्टी की वरिष्ठ नेता शताब्दी राय ने इस पूरे घटनाक्रम पर नेतृत्व को जमकर आड़े हाथों लिया है। उन्होंने इसे व्यक्तिगत मामला मानने से इनकार करते हुए कहा कि जब 20 से अधिक सांसद एक साथ पार्टी छोड़ने को तैयार हों, तो यह नेतृत्व की गंभीर विफलता का प्रमाण है। शताब्दी राय ने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी संगठन के भीतर पनप रहे असंतोष को समझने में पूरी तरह नाकाम रहीं। उन्होंने यह भी कहा कि अभिषेक बनर्जी और चुनावी रणनीतिकार संस्था ‘आइपैक’ को जरूरत से ज्यादा अधिकार देने के कारण जमीनी स्तर के पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं का भरोसा पार्टी से टूट गया है।
टीएमसी के भीतर छिड़ी यह जंग अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है। यदि यह 22 सांसद और 64 विधायक औपचारिक रूप से अलग होते हैं, तो यह ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर और पार्टी के अस्तित्व के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी। फिलहाल कोलकाता से लेकर दिल्ली तक इस सियासी हलचल पर पैनी नजर रखी जा रही है और आने वाले कुछ घंटे बंगाल की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं।
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