नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं के कारण भारत ने अपनी ऊर्जा रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद में फरवरी के मुकाबले लगभग 90 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब होर्मुज स्ट्रेट में उत्पन्न अवरोधों के कारण मध्य-पूर्व से होने वाली तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है और भारत के कुल कच्चे तेल आयात में लगभग 15 प्रतिशत की कुल गिरावट आई है।
ग्लोबल डेटा एनालिटिक्स फर्म केपर के मुख्य विश्लेषक सुमित रिटोइया के अनुसार, रूस से आयात में इस अचानक तेजी की एक प्रमुख वजह अमेरिका द्वारा दी गई 30 दिनों की विशेष राहत रही। इस छूट के तहत समुद्र में पहले से मौजूद उन रूसी तेल टैंकरों को खरीदने की अनुमति मिली जो प्रतिबंधों के दायरे में थे। इसके अतिरिक्त, भारत अब अपनी जरूरतों के लिए अंगोला, गैबॉन, घाना और कांगो जैसे अफ्रीकी देशों से भी तेल आयात बढ़ा रहा है, हालांकि कुल आपूर्ति में इनका हिस्सा फिलहाल सीमित है।
ऊर्जा संकट का असर केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहा। होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट के चलते मार्च में भारत के एलपीजी आयात में 40 प्रतिशत की बड़ी कमी आई है। विशेष रूप से कतर से होने वाली एलएनजी आपूर्ति में 92 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई, क्योंकि वहां की प्रमुख कंपनी कतरएनर्जी ने ‘फोर्स मेज्योर’ घोषित कर दिया था। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत ने अमेरिका, ओमान और नाइजीरिया जैसे वैकल्पिक स्रोतों का रुख किया है। घरेलू स्तर पर 33.2 करोड़ उपभोक्ताओं को रसोई गैस की किल्लत न हो, इसके लिए सरकार ने व्यावसायिक आपूर्ति को सीमित कर घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया है।
आपूर्ति को सुचारू बनाए रखने के लिए सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे उत्पादक देश अब होर्मुज स्ट्रेट को बाईपास करने वाली अपनी विशेष पाइपलाइनों का उपयोग कर रहे हैं। इसमें सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और यूएई की हबशान-फुजैरा पाइपलाइन शामिल है। इन वैकल्पिक मार्गों से भारत को समुद्री बाधाओं के बावजूद तेल प्राप्त करने में कुछ राहत मिली है।
सुमित रिटोइया ने भविष्य की संभावनाओं पर कहा कि अप्रैल में भी रूस से तेल की खरीद जारी रहने की उम्मीद है। साथ ही भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ईरान और वेनेजुएला से भी कच्चे तेल का आयात शुरू कर सकता है। इन नए स्रोतों से जुड़ने के बाद भारत को आपूर्ति से जुड़े जोखिमों को कम करने में मदद मिलने की संभावना है।
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