शिमला। हिमाचल प्रदेश में भूमि कानूनों की सबसे संवेदनशील कड़ी मानी जाने वाली धारा 118 को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी बवंडर खड़ा हो गया है। राजधानी शिमला सहित प्रदेश के अन्य हिस्सों में हुए ‘संयुक्त विकास समझौतों’ (जेडीए) के माध्यम से भूमि नियंत्रण बाहरी पक्षों को सौंपने के मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। राजस्व विभाग द्वारा उठाई गई गम्भीर आपत्तियों के बाद प्रदेश सरकार के आवास विभाग ने अब राज्य विजिलेंस एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से इस पूरे मामले पर कानूनी राय मांगी है। इस कदम से न केवल रियल एस्टेट जगत, बल्कि हिमाचल प्रदेश रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
मामले की जड़ में ‘हिमाचल प्रदेश भू-स्वामित्व एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1972’ की धारा 118 है, जो राज्य में गैर-कृषकों और बाहरी व्यक्तियों द्वारा कृषि भूमि की खरीद पर कड़ा प्रतिबंध लगाती है। सरकार को अंदेशा है कि कई रियल एस्टेट परियोजनाओं में बिल्डरों और निवेशकों ने स्थानीय किसानों के साथ जेडीए के नाम पर ऐसे समझौते किए हैं, जो इस कानून की मूल भावना के सीधे खिलाफ हैं। इन समझौतों में जमीन तो किसान के नाम पर रहती है, लेकिन निर्माण कार्य और व्यावसायिक नियंत्रण पूरी तरह से बाहरी डेवलपर के पास चला जाता है, जो धारा 118 के प्रावधानों का एक परोक्ष उल्लंघन माना जा रहा है।
आवास विभाग के अतिरिक्त सचिव सुनील वर्मा द्वारा विजिलेंस के महानिदेशक को भेजे गए पत्र में स्पष्ट किया गया है कि राजस्व विभाग ने सात नवंबर 2023 को ही इस संबंध में स्पष्टीकरण जारी कर दिया था। इसके बावजूद रेरा के स्तर पर इन संदिग्ध समझौतों को मंजूरी दी गई और कोई प्रभावी सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए। आवास विभाग द्वारा इस विषय पर पूर्व में भेजे गए पत्रों पर अधिकारियों की लंबी चुप्पी ने अब सरकार की चिंता और बढ़ा दी है। सूत्रों का कहना है कि यदि इस मामले में औपचारिक विजिलेंस जांच शुरू होती है, तो कई बड़ी रियल एस्टेट परियोजनाएं अधर में लटक सकती हैं और रेरा के जिम्मेदार अधिकारी जांच के घेरे में आ सकते हैं।
राज्य सरकार ने इस कानूनी उलझन को सुलझाने के लिए विजिलेंस से तीन मुख्य बिंदुओं पर राय मांगी है। पहला, क्या धारा 118 के संभावित उल्लंघन के लिए रेरा के अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जा सकती है? दूसरा, जब राजस्व विभाग ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर दिए थे, तो रेरा ने उन पर कार्रवाई क्यों नहीं की? और तीसरा, विभाग द्वारा किए गए पत्राचार के बावजूद इस मामले में हुई अत्यधिक देरी और अधिकारियों की चुप्पी के पीछे क्या वास्तविक कारण रहे?
हिमाचल प्रदेश में जमीन एक भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दा रही है। बाहरी लोगों को जमीन के परोक्ष हस्तांतरण के इन मामलों ने सचिवालय से लेकर रेरा कार्यालय तक हलचल मचा दी है। रियल एस्टेट डेवलपर्स इसे निवेश और विकास का एक वैध माध्यम बता रहे हैं, जबकि राजस्व विभाग इसे कानून में सेंध लगाने की कोशिश मान रहा है। अब सरकार विजिलेंस की रिपोर्ट के आधार पर भविष्य की रणनीति तय करेगी। इस मामले के नतीजे न केवल वर्तमान परियोजनाओं के भविष्य का फैसला करेंगे, बल्कि हिमाचल में रियल एस्टेट कारोबार के नियमों को भी बदल सकते हैं। फिलहाल, अधिकारियों की भूमिका पर उठ रहे सवालों ने प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में तनाव का माहौल बना दिया है।