नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने चुनाव से ठीक पहले जनता को मुफ्त उपहार (फ्रीबीज) बांटने की परिपाटी पर तमिलनाडु सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले के माध्यम से वह देश के अन्य राज्यों को भी एक कड़ा संदेश देना चाहता है। अदालत ने चेतावनी दी कि उपयोगिताओं और सेवाओं के लिए भुगतान करने में सक्षम लोगों को भी बिना सोचे-समझे मुफ्त सुविधाएं देना एक ऐसी संस्कृति को जन्म दे रहा है, जो काम न करने वालों को पुरस्कृत करती है।
इस मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तमिलनाडु सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि अगर सरकार मुफ्त भोजन, मुफ्त बिजली और मुफ्त साइकिल देने जैसी शुरुआत करती है, तो वह समाज में किस तरह की संस्कृति का निर्माण कर रही है। मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा कि पूरे भारत में जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है, वह चिंताजनक है। एक कल्याणकारी व्यवस्था के अंतर्गत उन लोगों को बिजली या अन्य सहायता देना समझ में आता है जो इसका आर्थिक बोझ नहीं उठा सकते, लेकिन जो लोग पैसे दे सकते हैं और जो नहीं दे सकते, उनके बीच बिना कोई अंतर किए चीजें बांटना महज तुष्टिकरण की नीति है।
अदालत ने सरकार को उसकी जिम्मेदारियों का अहसास कराते हुए कहा कि कभी-कभी ऐसी स्थितियां वाकई परेशान करने वाली होती हैं। मुख्य न्यायाधीश के अनुसार, भले ही कोई राज्य राजस्व के मामले में बेहतर स्थिति में हो, लेकिन क्या यह सरकार का दायित्व नहीं है कि वह पूरी जनता के सामूहिक विकास पर ध्यान केंद्रित करे? कोर्ट ने कहा कि सरकारों को अपना पैसा बुनियादी ढांचे, बेहतर अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों के विकास पर खर्च करना चाहिए। इसके विपरीत, चुनाव नजदीक आते ही केवल चीजें बांटने पर जोर दिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकारों की इन नीतियों के चलते विकास कार्यों के लिए कोष में एक भी पैसा शेष नहीं बचता है। अदालत ने यह भी माना कि यह केवल तमिलनाडु की नहीं, बल्कि देश के लगभग सभी राज्यों की एक बड़ी समस्या बन चुकी है।
यह पूरा मामला तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट रूल्स 2024 के नियम 23 को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने अब इस विषय पर तमिलनाडु सरकार को अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। अदालत ने विशेष रूप से सरकार से यह पूछा है कि मुफ्त बिजली देने के अपने वादे को पूरा करने के लिए वह धन की व्यवस्था कहां से कर रही है और इसका वित्तीय स्रोत क्या है।
Pls read:SC: बिल्डरों के मददगार बन गए हैं ‘रेरा’, सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी