Uttarakhand: गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति को हाई कोर्ट में चुनौती यूजीसी से मांगा गया जवाब – The Hill News

Uttarakhand: गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति को हाई कोर्ट में चुनौती यूजीसी से मांगा गया जवाब

नैनीताल। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर हुई नियुक्ति को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने कुलपति श्रीप्रकाश सिंह की नियुक्ति को निरस्त करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने इस मामले में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को नोटिस जारी करते हुए तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई के लिए 11 मार्च की तारीख तय की गई है।

यह याचिका नवीन प्रकाश नौटियाल द्वारा दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुलपति श्रीप्रकाश सिंह की नियुक्ति में निर्धारित वैधानिक नियमों की पूरी तरह अनदेखी की गई है। याचिकाकर्ता के दावे के अनुसार, यह नियुक्ति केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम 2009 और यूजीसी विनियम 2018 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यूजीसी विनियमों और स्वयं शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञापन में तय पात्रता शर्तों का पालन न करना इस नियुक्ति को मनमाना और अवैध बनाता है।

मामले का सबसे प्रमुख बिंदु यूजीसी विनियम 2018 का नियम 7.3 है। इस नियम के तहत किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति बनने के लिए किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में कम से कम दस वर्षों का शैक्षणिक अनुभव होना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता का कहना है कि श्रीप्रकाश सिंह के पास यह अनिवार्य अनुभव नहीं है। उनके द्वारा भारतीय लोक प्रशासन संस्थान में चेयर प्रोफेसर के रूप में किए गए कार्य को विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के अनुभव के समकक्ष नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह संस्थान न तो कोई विश्वविद्यालय है और न ही यूजीसी के मानकों के तहत संचालित होने वाली कोई संस्था है।

याचिका में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि शिक्षा मंत्रालय के विज्ञापन में पात्रता को स्पष्ट रूप से ‘विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में 10 वर्ष’ तक ही सीमित रखा गया था। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि चयन समिति को चयन प्रक्रिया के बीच में पात्रता शर्तों को बदलने या उनमें ढील देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि ऐसी मनमानी नियुक्तियां शैक्षणिक संस्थानों की गरिमा और अखंडता को चोट पहुंचाती हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन है। अदालत अब तीन सप्ताह बाद यूजीसी के जवाब के आधार पर इस नियुक्ति की वैधता की समीक्षा करेगी।

 

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