Cricket: खेल संस्थाओं के प्रबंधन में गैर विशेषज्ञों की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट सख्त कहा जिन्हें बल्ला पकड़ना नहीं आता उन्हें नेतृत्व क्यों – The Hill News

Cricket: खेल संस्थाओं के प्रबंधन में गैर विशेषज्ञों की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट सख्त कहा जिन्हें बल्ला पकड़ना नहीं आता उन्हें नेतृत्व क्यों

नई दिल्ली। भारत की सर्वोच्च अदालत ने खेल संस्थाओं के प्रबंधन और उनके नेतृत्व को लेकर एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट रूप से नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि खेल निकायों, विशेषकर क्रिकेट संघों की कमान उन अनुभवी खिलाड़ियों के हाथों में होनी चाहिए जिन्होंने मैदान पर पसीना बहाया है, न कि ऐसे लोगों के हाथों में जिन्हें खेल की बुनियादी जानकारी तक नहीं है। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि क्रिकेट संघों का नेतृत्व संन्यास ले चुके क्रिकेटरों को करना चाहिए, न कि उन लोगों को जिन्हें “बल्ला पकड़ना भी नहीं आता”। इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि न्यायपालिका अब खेल संस्थाओं में बढ़ते राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप को समाप्त करने के पक्ष में है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जायमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने महाराष्ट्र क्रिकेट संघ (एमसीए) के चुनावों से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण संदेश दिया। पीठ ने बंबई उच्च न्यायालय के उस आदेश में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया, जिसने एमसीए के आगामी चुनावों पर रोक लगा दी थी। गौरतलब है कि ये चुनाव मूल रूप से छह जनवरी को होने वाले थे, लेकिन ‘भाई-भतीजावाद और पक्षपात’ के गंभीर आरोपों के बाद मामला कानूनी पेचीदगियों में फंस गया। सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए उन याचिकाओं को खारिज कर दिया जो एमसीए द्वारा चुनावों पर लगी रोक हटाने के लिए दायर की गई थीं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने एमसीए की सदस्यता सूची में आई अचानक और भारी बढ़ोतरी पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। रिकॉर्ड का हवाला देते हुए पीठ ने आश्चर्य जताया कि जिस संघ में 1986 से लेकर 2023 तक के लंबे अंतराल में केवल 164 सदस्य थे, वहां 2023 के ठीक बाद सदस्यों की संख्या में इतनी बड़ी छलांग कैसे लग गई। प्रधान न्यायाधीश ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा कि क्या 2023 के बाद संस्था ने कोई ‘बंपर ड्रॉ’ निकाला था, जिससे सदस्यों की संख्या अचानक बढ़ गई। अदालत का मानना है कि इस तरह की अचानक वृद्धि चुनावों को प्रभावित करने और विशेष गुट को फायदा पहुँचाने के उद्देश्य से की गई हो सकती है।

एमसीए और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी-एसपी) के विधायक रोहित पवार सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखा। सिंघवी ने दलील दी कि सदस्यता बढ़ाने की पूरी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी और एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति ने इसकी कड़ी देखरेख की थी। उन्होंने बताया कि समिति ने गहन समीक्षा के बाद 48 सदस्यों के आवेदनों को खारिज कर दिया था और अन्य पात्र लोगों को ही शामिल किया गया था। हालांकि, अदालत उनकी इन दलीलों से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आई और सदस्यता में हुई इस अभूतपूर्व वृद्धि के पीछे की मंशा पर संदेह बना रहा।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने एक बार फिर लोढ़ा कमेटी की उन सिफारिशों की याद दिला दी है, जिनमें खेल संघों के लोकतंत्रीकरण और पारदर्शिता की बात कही गई थी। अदालत का मानना है कि जब तक खेल निकायों का नेतृत्व उन लोगों के पास नहीं होगा जो खेल की गहरी समझ रखते हैं, तब तक पक्षपात और भाई-भतीजावाद जैसी समस्याओं का अंत नहीं हो सकेगा। गैर-विशेषज्ञों और राजनीतिक हस्तियों के वर्चस्व के कारण अक्सर योग्य खिलाड़ियों और खेल के हितों की अनदेखी की जाती है, जो अंततः देश की खेल प्रतिभाओं के लिए नुकसानदेह साबित होता है।

महाराष्ट्र क्रिकेट संघ के इस मामले ने पूरे देश के खेल प्रशासकों के बीच हड़कंप मचा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट इस दिशा में कोई कड़ा दिशा-निर्देश जारी करता है, तो कई खेल संस्थाओं में वर्षों से जमे गैर-खिलाड़ी पदाधिकारियों को अपनी कुर्सियां छोड़नी पड़ सकती हैं। अदालत के कड़े रुख ने यह साफ कर दिया है कि वह खेल संस्थाओं में पारदर्शिता और विशेषज्ञों की भूमिका सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। फिलहाल, एमसीए के चुनावों पर रोक जारी रहेगी और संस्था को सदस्यता वृद्धि से जुड़े तथ्यों पर अदालत को संतुष्ट करना होगा। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी आने वाले समय में खेल संघों के ढांचे में बड़े सुधारों का आधार बन सकती है।

 

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