नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पाकिस्तान को शामिल किए जाने की आधिकारिक पुष्टि हो गई है। गुरुवार को इस निर्णय पर मुहर लगा दी गई, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। हालांकि, इस फैसले को लेकर इजरायल ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है, लेकिन उसके ऐतराज के बावजूद पाकिस्तान को इस महत्वपूर्ण बोर्ड में जगह दी गई है। यह बोर्ड मुख्य रूप से गाजा क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने और वहां युद्ध के बाद होने वाले पुनर्निर्माण कार्यों की निगरानी के लिए तैयार किया गया है।
इस बोर्ड के गठन के साथ ही अमेरिका ने भारत को भी इसमें शामिल होने का औपचारिक न्योता भेजा है। फिलहाल, भारत सरकार की ओर से इस आमंत्रण पर कोई प्रतिक्रिया या आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है। भारत के लिए इस समूह का हिस्सा बनना एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती माना जा रहा है, क्योंकि भारत लगातार सीमा पार से होने वाले आतंकवाद में पाकिस्तान की संलिप्तता का मुद्दा उठाता रहा है। विशेष रूप से 22 अप्रैल को जम्मू और कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण हमले के बाद भारत का रुख पाकिस्तान के प्रति और सख्त हुआ है। ऐसी स्थिति में, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का डोनल्ड ट्रंप और उनके सहयोगी देश तुर्की के साथ खड़ा होना भारत के लिए सहज स्थिति नहीं है।
पाकिस्तान की इस बोर्ड में भागीदारी पर इजरायल ने भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस महीने की शुरुआत में भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने गाजा को लेकर किसी भी जमीनी योजना या प्रशासनिक ढांचे में पाकिस्तानी सेना की भूमिका को पूरी तरह से नकार दिया था। इजरायल का मानना है कि पाकिस्तान को इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाना सुरक्षा के लिहाज से जोखिम भरा हो सकता है।
राजदूत रूवेन अजार के अनुसार, इजरायल पाकिस्तान की मौजूदगी से बिल्कुल भी सहज नहीं है। इसके पीछे मुख्य कारण हमास और पाकिस्तान की जमीन से संचालित होने वाले विभिन्न आतंकी संगठनों के बीच बढ़ते हुए संबंध हैं। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि गाजा में भविष्य की किसी भी शांति योजना के लिए हमास का पूर्ण विनाश अनिवार्य है और इसमें कोई दूसरा रास्ता संभव नहीं है। इजरायल को डर है कि पाकिस्तान की भागीदारी से हमास जैसे समूहों को परोक्ष रूप से लाभ मिल सकता है।
इजरायली राजदूत ने कूटनीतिक संबंधों की बारीकियों पर चर्चा करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश सामान्यतः उन्हीं के साथ मिलकर काम करना पसंद करते हैं जिन पर उन्हें भरोसा होता है और जिनके साथ उनके बेहतर राजनयिक संबंध होते हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि वर्तमान में पाकिस्तान के साथ इजरायल के ऐसे संबंध नहीं हैं कि उन्हें एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्वीकार किया जा सके। इजरायल के अनुसार, गाजा को स्थिर करने के किसी भी अंतरराष्ट्रीय तंत्र में पाकिस्तान एक स्वीकार्य पार्टनर नहीं हो सकता।
डोनल्ड ट्रंप के इस फैसले ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की भविष्य की दिशा और उसकी स्वीकार्यता पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ जहां अमेरिका क्षेत्रीय शक्तियों को एक साथ लाने का प्रयास कर रहा है, वहीं इजरायल का विरोध और भारत की चुप्पी इस बोर्ड की सफलता में बड़ी बाधा बन सकती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या भारत इस बोर्ड का हिस्सा बनता है या पाकिस्तान की मौजूदगी के कारण इससे दूरी बनाए रखता है। फिलहाल, पाकिस्तान की एंट्री ने मध्य पूर्व की शांति प्रक्रिया में एक नया और विवादित अध्याय जोड़ दिया है।
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