शिमला। हिमाचल प्रदेश में ग्रामीण शासन की 3577 पंचायतों, ब्लॉक समितियों और जिला परिषदों का कार्यकाल समाप्त होने के करीब है। 31 जनवरी के बाद इन संस्थाओं की कमान किसके पास रहेगी, यह एक बड़ा प्रशासनिक सवाल बना हुआ है। प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस मामले में स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि किसी भी स्थिति में निर्वाचित पंचायतों का कार्यकाल पांच साल से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। ऐसे में वर्तमान निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की शक्तियां अब कानूनन समाप्त होने की कगार पर हैं और सत्ता का हस्तांतरण सरकारी तंत्र की ओर होने वाला है।
पंचायती राज अधिनियम की धारा 120 इस मामले में काफी सख्त और स्पष्ट है। इसके प्रावधानों के अनुसार, किसी भी पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तारीख से केवल पांच साल तक ही हो सकता है। पांच वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद कोई भी पंचायत अपने पद पर जारी नहीं रह सकती। कानून यह भी कहता है कि पंचायत के गठन के लिए चुनाव निर्धारित कार्यकाल की समाप्ति से पहले ही संपन्न हो जाने चाहिए। यदि पंचायत बीच में भंग हो जाती है, तो छह महीने के भीतर पुनर्गठन अनिवार्य है।
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए राज्य सरकार अब पंचायतों का कामकाज चलाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर गंभीरता से विचार कर रही है। सूत्रों के अनुसार, 31 जनवरी के बाद पंचायतों के रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी पंचायत सचिवों को सौंपी जा सकती है। हालांकि, इन सचिवों के पास वित्तीय शक्तियां नहीं होंगी, वे केवल रूटीन के कागजी कार्य ही देख सकेंगे। आमतौर पर यदि चुनाव में लंबा समय होता है तो प्रशासक नियुक्त किए जाते हैं या विशेष समितियां बनाई जाती हैं, लेकिन चूंकि हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने 30 अप्रैल तक चुनाव कराने का सख्त निर्देश दिया है, इसलिए यह अंतराल काफी कम है। इसी कम समय को देखते हुए प्रशासकों की लंबी प्रक्रिया के बजाय सचिवों को सीमित शक्तियां देने की तैयारी की जा रही है।
अधिनियम की धारा 128(3) में यह नियम है कि यदि निर्धारित समय से पहले पंचायत का पुनर्गठन नहीं होता है, तो वह स्वतः ही भंग मान ली जाएगी। इसके बाद की व्यवस्था के लिए धारा 140 लागू होती है। धारा 140(3)(ख) के तहत जब तक नई पंचायत का पुनर्गठन नहीं हो जाता, तब तक पंचायत की सभी शक्तियों और कर्तव्यों का निर्वहन राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति या समिति द्वारा किया जाएगा। कानून के मुताबिक, भंग की गई पंचायत को हर हाल में छह महीने के भीतर पुनर्गठित करना जरूरी है।
राज्य निर्वाचन आयोग ने भी उच्च न्यायालय के आदेशों के बाद अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। आरक्षण रोस्टर तैयार करने और अन्य चुनावी औपचारिकताओं को लेकर जिला अधिकारियों के साथ बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। अप्रैल के अंत तक नई पंचायतों का गठन होना तय है, लेकिन उससे पहले के इन तीन महीनों में पंचायतों का सुचारू प्रबंधन एक बड़ी चुनौती होगा। सरकार का मुख्य प्रयास यह है कि इस संक्रमणकालीन दौर में ग्रामीण क्षेत्रों के विकास कार्य बाधित न हों और सरकारी योजनाओं का लाभ जनता को मिलता रहे। इसके लिए जल्द ही सचिवों या विशेष अधिकारियों की शक्तियों को लेकर विस्तृत अधिसूचना जारी की जा सकती है। 31 जनवरी के बाद ग्रामीण क्षेत्रों का पूरा प्रशासनिक नियंत्रण निर्वाचित प्रधानों के हाथों से निकलकर सीधे सरकारी अधिकारियों के पास चला जाएगा।
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