नई दिल्ली। वेनेजुएला में हुए हालिया घटनाक्रमों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अब दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड पर अपनी नजरें टिका दी हैं। ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड को डेनमार्क के नियंत्रण से मुक्त कराकर संयुक्त राज्य अमेरिका के करीब लाने के लिए एक बेहद आकर्षक और महत्वाकांक्षी योजना पर विचार कर रहा है। इस रणनीति के तहत अमेरिका ग्रीनलैंड के प्रत्येक नागरिक को एक बड़ी एकमुश्त राशि देने का मन बना रहा है, ताकि वे अमेरिका के साथ जुड़ने के लिए राजी हो सकें। इस प्रस्ताव ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने व्हाइट हाउस के सूत्रों के हवाले से जानकारी दी है कि अमेरिकी अधिकारी ग्रीनलैंड के निवासियों को लुभाने के लिए प्रति व्यक्ति 10,000 से लेकर 1,00,000 डॉलर तक के भुगतान पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय मुद्रा में यह राशि लगभग 90 लाख रुपये तक बैठती है। हालांकि, व्हाइट हाउस ने अभी तक इस प्रस्ताव के विवरणों को सार्वजनिक नहीं किया है और चर्चा अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन इस ‘कैश ऑफर’ ने ग्रीनलैंड और डेनमार्क के बीच के समीकरणों को हिला दिया है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने इस योजना को लेकर अमेरिका के सांसदों के सामने अपना पक्ष रखा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रंप ग्रीनलैंड पर किसी भी प्रकार का सैन्य कब्जा नहीं करना चाहते, बल्कि वे इसे एक वैध सौदे के तहत खरीदना चाहते हैं। रूबियो के अनुसार, यह कदम अमेरिका की सामरिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ट्रंप की इस ‘रियल एस्टेट’ वाली कूटनीति का यूरोपीय देशों ने कड़ा विरोध शुरू कर दिया है।
ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच स्थित है और इसका क्षेत्रफल लगभग 21.66 लाख वर्ग किलोमीटर है। प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न यह द्वीप वर्तमान में डेनमार्क का एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है। लगभग 57,000 की आबादी वाले इस द्वीप पर अमेरिका का दावा कई यूरोपीय शक्तियों को नागवार गुजर रहा है। फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और ब्रिटेन जैसे प्रमुख देशों ने डेनमार्क के साथ मिलकर एक संयुक्त बयान जारी किया है। इन देशों का कहना है कि ग्रीनलैंड का भविष्य तय करने का अधिकार केवल वहां के निवासियों और डेनमार्क को है और अमेरिकी हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं के खिलाफ है।
अमेरिकी प्रस्ताव पर ग्रीनलैंड के भीतर से भी तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन ने राष्ट्रपति ट्रंप के अधिग्रहण के सुझाव को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ‘बहुत हो गया… अब इस तरह के विलय की कोई कल्पना नहीं चलेगी।’ उन्होंने साफ किया कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। डेनमार्क और अमेरिका के नाटो सहयोगी होने के बावजूद, वाशिंगटन के इस रुख ने दोनों देशों के बीच राजनयिक दरार पैदा कर दी है।
इस विरोध के बावजूद व्हाइट हाउस अपने कदम पीछे हटाता नहीं दिख रहा है। प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने पुष्टि की है कि ट्रंप और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम इस संभावित खरीद के विभिन्न पहलुओं और कानूनी स्वरूप पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगले सप्ताह वाशिंगटन में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और उनके डेनिश समकक्ष के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें ग्रीनलैंड के भविष्य और इस अमेरिकी प्रस्ताव पर चर्चा की जाएगी। ट्रंप की इस पहल ने विश्व राजनीति में एक बार फिर ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत विस्तारवादी आर्थिक कूटनीति को केंद्र में ला खड़ा किया है।
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