चंडीगढ़। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर ‘लैंड रेवेन्यू सेस’ लगाने के फैसले ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। हिमाचल सरकार द्वारा पूर्व में ‘वाटर सेस’ लगाने की कोशिशों में विफल रहने के बाद उठाए गए इस कदम का पंजाब सरकार ने कड़ा विरोध किया है। पंजाब सरकार के अनुसार, इस नए टैक्स से राज्य के खजाने पर हर साल लगभग 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त और अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ेगा। इस फैसले को लेकर पंजाब और हिमाचल के बीच तनाव बढ़ता नजर आ रहा है।
पंजाब के जल स्रोत विभाग के मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने इस मामले पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे संघीय ढांचे और सिद्धांतों पर एक बड़ा हमला करार दिया। गोयल ने कहा कि हिमाचल प्रदेश सरकार का यह निर्णय पंजाब के हितों के खिलाफ बुना गया एक सीधा षड्यंत्र है। उन्होंने भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड (बीबीएमबी) पर थोपे गए 500 करोड़ रुपये के वित्तीय बोझ को पूरी तरह से निराधार और गैर-कानूनी बताया। पंजाब सरकार का मानना है कि इस तरह के एकतरफा फैसले राज्यों के आपसी तालमेल को बिगाड़ने वाले हैं।
मंगलवार को चंडीगढ़ में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बरिंदर कुमार गोयल ने स्पष्ट किया कि इस तथाकथित नए सेस का कोई कानूनी आधार नहीं है। उन्होंने इसे कांग्रेस की पुरानी कार्यशैली का हिस्सा बताते हुए ‘दादागिरी’ करार दिया। गोयल ने याद दिलाया कि यह पहली बार नहीं है जब हिमाचल सरकार ने इस तरह का कदम उठाया है। इससे पहले 6 मार्च 2023 को भी हिमाचल की कांग्रेस सरकार ने ‘वॉटर सेस’ लगाने का प्रयास किया था। उस समय भी इस फैसले को कानूनी चुनौती दी गई थी और अंततः इसे अवैध ठहराए जाने के बाद सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े थे।
मंत्री गोयल ने ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि भाखड़ा बांध और विभिन्न हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के निर्माण के लिए जमीन का अधिग्रहण 1950 के दशक में ही पूरा कर लिया गया था। उस समय नियम के अनुसार सभी जमीन मालिकों को उचित मुआवजा भी दिया जा चुका है। ऐसे में दशकों बाद उसी जमीन पर दोबारा किसी भी तरह का ‘लैंड रेवेन्यू सेस’ वसूलना कानूनन गलत है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब जमीन का मालिकाना हक और मुआवजे की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है, तो अब इस नए टैक्स का क्या औचित्य है?
पंजाब सरकार ने साफ कर दिया है कि वह इस टैक्स को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगी। बरिंदर कुमार गोयल ने कहा कि पंजाब के हितों की रक्षा के लिए सरकार हर संभव मंच पर अपनी आवाज उठाएगी। इस मुद्दे को न केवल बीबीएमबी के समक्ष रखा जाएगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर अदालत का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि पंजाब अपने अधिकारों के लिए पूरी ताकत से लड़ाई लड़ेगा। हिमाचल सरकार द्वारा लगाया गया यह वित्तीय बोझ न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि यह अंतरराज्यीय समझौतों का भी उल्लंघन है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर पड़ोसी राज्यों के बीच जल और बिजली परियोजनाओं से जुड़े संसाधनों पर नियंत्रण की बहस को तेज कर दिया है।