US: एच-1बी वीजा पर एक लाख डॉलर फीस के खिलाफ अमेरिका के बीस राज्यों ने किया मुकदमा

अमेरिका में एच-1बी वीजा आवेदनों पर फीस बढ़ाने के मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है। अमेरिका के 20 राज्यों ने राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के उस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है जिसमें एच-1बी वीजा के नए आवेदनों पर एक लाख डॉलर का भारी शुल्क लगाने का आदेश दिया गया था। इन राज्यों ने एकजुट होकर इस विवादास्पद निर्णय के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया है। राज्यों का कहना है कि प्रशासन का यह फैसला न केवल मनमाना है बल्कि अमेरिकी कानूनों का उल्लंघन भी करता है।

इस कानूनी लड़ाई की अगुवाई कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोंटा कर रहे हैं। दायर किए गए मुकदमे में मैसाचुसेट्स, न्यूयॉर्क और इलिनोइस जैसे 20 डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रभाव वाले राज्य शामिल हैं। इन राज्यों ने अदालत में तर्क दिया है कि वीजा फीस में इतनी बड़ी बढ़ोतरी पूरी तरह से गैरकानूनी है। उनका कहना है कि ट्रंप प्रशासन के पास इस तरह का शुल्क थोपने का कोई अधिकार नहीं था। राज्यों की दलील है कि यह फैसला अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और पब्लिक स्कूलों जैसी जरूरी सेवाओं के लिए एक गंभीर खतरा बनकर उभरेगा।

गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 19 सितंबर 2025 को इस नए नियम की घोषणा की थी। इस घोषणा में कहा गया था कि नए एच-1बी वीजा आवेदनों पर अब एक लाख डॉलर का शुल्क देना होगा। हैरानी की बात यह रही कि इस घोषणा के तुरंत बाद 21 सितंबर से होने वाले आवेदनों पर इसे लागू भी कर दिया गया। राज्यों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि पहले एच-1बी वीजा के लिए कुल शुल्क 960 डॉलर से लेकर 7,595 डॉलर के बीच हुआ करता था। अब इसे बढ़ाकर सीधे एक लाख डॉलर कर दिया गया है। इतनी महंगी फीस शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की कमर तोड़ देगी जहां पहले से ही कर्मचारियों की भारी कमी है।

कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोंटा ने इस मुकदमे के पक्ष में मजबूत दलीलें पेश की हैं। उन्होंने कहा कि कैलिफोर्निया दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यह राज्य भली-भांति जानता है कि कुशल प्रतिभाएं कितनी महत्वपूर्ण होती हैं। जब दुनिया भर से हुनरमंद लोग उनके वर्कफोर्स में शामिल होते हैं तो इससे राज्य की तरक्की होती है। रॉब बोंटा ने कहा कि डोनल्ड ट्रंप द्वारा निर्धारित एक लाख डॉलर का यह अवैध शुल्क कैलिफोर्निया के सार्वजनिक नियोक्ताओं और सेवा प्रदाताओं पर एक अनावश्यक वित्तीय बोझ डाल रहा है। इससे प्रमुख क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की किल्लत और बढ़ जाएगी।

राज्यों ने प्रशासन पर कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने का भी गंभीर आरोप लगाया है। उनका तर्क है कि ट्रंप प्रशासन ने यह भारी-भरकम शुल्क लगाने के लिए न तो अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस की मंजूरी ली और न ही प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम के तहत जरूरी नियम बनाने की प्रक्रिया का पालन किया। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो एच-1बी वीजा की फीस केवल कार्यक्रम को चलाने में आने वाले खर्च तक ही सीमित रही है। इसका उद्देश्य कभी भी मनमाने तरीके से सरकार के लिए राजस्व जुटाना नहीं रहा है।

मुकदमा करने वाले राज्यों का स्पष्ट कहना है कि यह नया शुल्क अमेरिकी संविधान के साथ-साथ संघीय आव्रजन कानूनों का सीधा उल्लंघन है। इसका सबसे बुरा असर सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ेगा। पब्लिक अस्पताल, यूनिवर्सिटी और स्कूल इतना भारी शुल्क वहन नहीं कर पाएंगे। इसके चलते विदेशों से आने वाले शिक्षकों और डॉक्टरों की भर्ती मुश्किल हो जाएगी और अमेरिका में इन पेशेवरों की कमी का संकट और गहरा हो जाएगा।

 

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