इस्लामाबाद। पाकिस्तान में विपक्ष के नेता महमूद खान अचकजई ने दावा किया है कि जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के संस्थापक इमरान खान पर ऐसे समझौते के लिए दबाव बनाया जा रहा है, जिसके तहत उन्हें देश छोड़ना पड़ सकता है। अचकजई ने इसकी तुलना पूर्व प्रधानमंत्रियों नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो के निर्वासन से जुड़ी परिस्थितियों से की है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और फिलहाल इमरान खान के संबंध में किसी निर्वासन समझौते की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
पाकिस्तानी अखबार डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, पख्तूनख्वा मिली अवामी पार्टी (पीकेएमएपी) के अध्यक्ष अचकजई ने शुक्रवार को पेशावर हाई कोर्ट में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ये आरोप लगाए। उन्होंने सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) पर भी निशाना साधते हुए कहा कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां पहले के दौर जैसी दिखाई दे रही हैं।
विपक्षी दलों की बैठक बुलाने की तैयारी
प्रेस कॉन्फ्रेंस में अचकजई के साथ तहरीक-ए-तहफुज-ए-आईन-ए-पाकिस्तान (टीटीएपी) के नेता सरदार अख्तर मेंगल और सीनेट में विपक्ष के नेता राजा नासिर अब्बास भी मौजूद थे। अचकजई ने बताया कि विपक्षी दल लगातार एक-दूसरे के संपर्क में हैं और जल्द ही सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित करने की योजना है। उन्होंने कहा कि विधानसभाओं से इस्तीफा देना भी विपक्ष के पास एक विकल्प है। सरकार की ओर से बातचीत का प्रस्ताव मिलने के बाद विपक्ष अपनी मांगें सौंप चुका है।
नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो के निर्वासन का दिया उदाहरण
अचकजई की टिप्पणी पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास की उन घटनाओं की ओर संकेत करती है, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो लंबे समय तक देश से बाहर रहे थे।
परवेज मुशर्रफ के नेतृत्व में 1999 में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद नवाज शरीफ को सत्ता से हटा दिया गया था। बाद में सऊदी अरब की मध्यस्थता से हुए समझौते के तहत वह वर्ष 2000 में पाकिस्तान से बाहर चले गए थे।
वहीं, बेनजीर भुट्टो वर्ष 1997 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की चुनावी हार और राष्ट्रपति फारूक लेघारी के साथ राजनीतिक टकराव के बाद देश से बाहर चली गई थीं। उनके पति आसिफ अली जरदारी भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में बंद रहे और 2004 में रिहा हुए थे।
अचकजई के बयान से इमरान खान के मामले में भी इसी तरह की किसी संभावित राजनीतिक व्यवस्था की आशंका जताई गई है। हालांकि, उनके आरोप किसी समझौते के होने या उस पर बातचीत चलने का प्रमाण नहीं हैं।
संसद को मजबूत करने और निष्पक्ष चुनाव की मांग
अचकजई ने कैदियों से मुलाकात पर लगाई गई पाबंदियों की आलोचना करते हुए कहा कि राजनीतिक तनाव कम करने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने संसद को अधिक अधिकार देने और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र चुनाव आयोग की भूमिका मजबूत करने की मांग भी उठाई।
उन्होंने खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री और अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्थिति को लेकर चिंता जताई। साथ ही कहा कि प्रांत के प्राकृतिक संसाधनों और खनिजों पर वहां के लोगों का पहला अधिकार होना चाहिए।
खैबर पख्तूनख्वा में गवर्नर शासन को अदालत में चुनौती
इस बीच, टीटीएपी के नेताओं ने पेशावर हाई कोर्ट में याचिका दायर कर खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल और गवर्नर शासन लागू करने के फैसले को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं ने 11 अक्टूबर की घोषणा को असंवैधानिक बताते हुए उसे रद्द करने की मांग की है।
याचिका में निर्वाचित मुख्यमंत्री और प्रांतीय मंत्रिमंडल को हटाने, विधानसभा की शक्तियां संसद को सौंपने तथा प्रस्तावित सलाहकार परिषद के गठन पर भी आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन कदमों के लिए जरूरी संवैधानिक शर्तें पूरी नहीं की गईं। उन्होंने अदालत से अंतरिम राहत देने का अनुरोध भी किया है, ताकि मामले की सुनवाई के दौरान निर्वाचित संस्थाओं के अधिकारों पर रोक लगाने वाले कदमों को रोका जा सके। मामले में अदालत के अंतिम फैसले और सरकार की प्रतिक्रिया पर आगे की स्थिति निर्भर करेगी।
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