Uttarakhand: ज्योलिकोट दूषित पेयजल प्रकरण पर मुख्य सचिव ने जताई नाराजगी

देहरादून, 23 सितंबर। नैनीताल जिले के ज्योलिकोट क्षेत्र में दूषित पेयजल की घटना को लेकर मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन ने बुधवार को सचिवालय में संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ बैठक की। उन्होंने प्रकरण की विस्तृत समीक्षा करते हुए पेयजल की गुणवत्ता और जनस्वास्थ्य से जुड़े मामलों में लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताई। मुख्य सचिव ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की जानकारी समय पर प्राप्त हो और तत्काल आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

मुख्य सचिव ने कहा कि प्रदेश में फील्ड स्तर पर विभिन्न विभागों के कर्मचारियों का व्यापक नेटवर्क मौजूद है। शिक्षक, पटवारी, ग्राम पंचायत अधिकारी, ट्यूबवेल ऑपरेटर समेत बड़ी संख्या में कार्मिक लगातार ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कार्य करते हैं। इस नेटवर्क का प्रभावी उपयोग करते हुए ऐसा सूचना एवं फीडबैक तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, जिससे पेयजल की गुणवत्ता अथवा स्वास्थ्य से जुड़ी किसी समस्या की सूचना तत्काल उच्च स्तर तक पहुंच सके। उन्होंने इस व्यवस्था की नियमित समीक्षा करने के निर्देश भी दिए।

बैठक में मुख्य सचिव ने प्रदेश की प्रमुख पेयजल योजनाओं की जियो मैपिंग और जीआईएस आधारित जियो-रेफरेंसिंग कराने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि पेयजल व्यवस्था का स्रोत से लेकर उपभोक्ता तक पूरा नेटवर्क मैप किया जाए। इसमें जल स्रोत, स्टोरेज टैंक, पाइपलाइन, सीवर लाइन और उनके क्रॉसिंग प्वाइंट्स समेत अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों को शामिल किया जाए। उन्होंने अगले 15 दिनों में प्रमुख वाटर सप्लाई स्कीम्स का भौतिक सत्यापन कराने को कहा।

भौतिक सत्यापन के दौरान जल स्रोत, भंडारण व्यवस्था, पाइपलाइनों और सीवर लाइनों की स्थिति की जांच करने के साथ संभावित लीकेज की पहचान करने के निर्देश दिए गए। स्टोरेज टैंकों की सफाई, क्लोरीनेशन, क्लोरीन की उपलब्धता और उपयोग का रिकॉर्ड व्यवस्थित रखने तथा पानी में कॉलीफॉर्म समेत आवश्यक गुणवत्ता मानकों की नियमित जांच सुनिश्चित करने को कहा गया। पुराने पाइपों को चिन्हित कर आवश्यकता के अनुसार उनके प्रतिस्थापन और अन्य सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश भी दिए गए।

मुख्य सचिव ने पेयजल और सीवरेज लाइनों की जांच के लिए स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी तैयार कर उसका कड़ाई से पालन कराने को कहा। उन्होंने निर्देश दिए कि पूर्व में जारी एसओपी के बावजूद यदि किसी क्षेत्र में पेयजल दूषित होने की घटना सामने आती है तो इसकी जांच की जाए कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किस स्तर पर नहीं हुआ।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एसटीपी और सतही जल के साथ प्रमुख शहरों में पेयजल की नियमित गुणवत्ता जांच की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए। प्रदेश के सभी सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का आकस्मिक निरीक्षण कराने को भी कहा गया। वहीं स्वास्थ्य विभाग को दूषित पेयजल से जुड़ी घटना की सूचना मिलते ही संबंधित क्षेत्र में स्वास्थ्य टीम भेजने और डॉक्टरों की टीम को सक्रिय रखने के निर्देश दिए गए। अगले 15 दिनों में आवश्यक स्वास्थ्य निगरानी और जांच की कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा गया।

मुख्य सचिव ने जिला स्तरीय समितियों को केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित न रहने की हिदायत दी। उन्होंने कहा कि समितियां फील्ड अधिकारियों के साथ समन्वय कर नियमित जानकारी और फीडबैक प्राप्त करें। इस व्यवस्था को एक बार की कार्रवाई के बजाय स्थायी निगरानी तंत्र के रूप में विकसित किया जाए और आवश्यकता के अनुसार स्थायी समितियां गठित कर नियमित बैठकें आयोजित की जाएं।

उन्होंने विभागों को पुराने अनुभवों और संस्थागत जानकारी का उपयोग करने की भी सलाह दी। सेवानिवृत्त लाइनमैन और लंबे समय तक फील्ड में काम कर चुके अनुभवी कर्मचारियों से पुराने पाइप नेटवर्क, क्रॉसिंग प्वाइंट और संवेदनशील स्थलों की जानकारी लेकर आवश्यक सुधार करने पर जोर दिया।

मुख्य सचिव ने स्पष्ट किया कि भविष्य में जनस्वास्थ्य से जुड़ी ऐसी घटना होने पर प्रथम दृष्टया लापरवाही पाए जाने पर संबंधित विभागाध्यक्षों की जवाबदेही तय की जाएगी। उन्होंने कहा कि जनस्वास्थ्य के मामलों में किसी भी स्तर की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

बैठक में सचिव रणवीर सिंह चौहान, वी. षणमुगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव पराग मधुकर धकाते, जल संस्थान के मुख्य महाप्रबंधक डी.के. सिंह तथा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जिलाधिकारी नैनीताल ललित मोहन रयाल समेत अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

 

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