लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा के सामने उत्तर प्रदेश में अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी का कोई सदस्य नहीं है, जबकि विधान परिषद में भी उसका प्रतिनिधित्व नहीं है। पार्टी के राज्यसभा में मौजूद एकमात्र सदस्य रामजी गौतम का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त होने के बाद उच्च सदन में भी बसपा की मौजूदा मौजूदगी खत्म हो जाएगी। ऐसे में पार्टी के सामने अपने राष्ट्रीय दल के दर्जे को बनाए रखने के लिए आगामी चुनावों में प्रदर्शन सुधारने की चुनौती रहेगी।
चुनाव आयोग के 2025 के रिकॉर्ड में बसपा को मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। आयोग की ओर से मई 2025 में राष्ट्रीय दलों के साथ आयोजित बैठकों की सूची में बसपा और उसकी अध्यक्ष मायावती का नाम भी शामिल है।
विधानसभा में भी नहीं है कोई विधायक
उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा की स्थिति 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद केवल एक सीट तक सीमित रह गई थी। बलिया की रसड़ा सीट से उमाशंकर सिंह ने बसपा के टिकट पर जीत हासिल की थी। उनके निधन के बाद विधानसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व भी समाप्त हो गया। इसके चलते अब पार्टी के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में ऐसा कोई विधायक नहीं है, जिसके समर्थन से वह राज्यसभा या विधान परिषद के चुनाव में अपने प्रत्याशी को आसानी से आगे बढ़ा सके।
राज्यसभा सदस्यों का चुनाव संबंधित राज्य की निर्वाचित विधानसभा के सदस्य करते हैं। निर्वाचन आयोग के अनुसार राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के माध्यम से होता है।
2024 लोकसभा चुनाव में नहीं खुला खाता
बसपा के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव भी महत्वपूर्ण रहा, जब उत्तर प्रदेश समेत देश में पार्टी का कोई उम्मीदवार लोकसभा नहीं पहुंच सका। इससे संसद के निचले सदन में उसका प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया। इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था और पार्टी के 10 उम्मीदवार विजयी हुए थे।
हालांकि इसके बाद पार्टी ने बड़े चुनावी गठबंधन से दूरी बनाए रखी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इसका असर उसके संसदीय प्रतिनिधित्व पर भी दिखाई दिया है। पार्टी अब आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
राज्यसभा में सीट बचाने के लिए पर्याप्त संख्या जरूरी
राज्यसभा चुनाव में किसी उम्मीदवार की जीत के लिए संबंधित विधानसभा में उपलब्ध निर्वाचित सदस्यों के आधार पर आवश्यक मतों की संख्या तय होती है। उत्तर प्रदेश में बसपा के पास वर्तमान में कोई विधायक नहीं है। ऐसे में अपने दम पर राज्यसभा की सीट हासिल करने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाना उसके लिए बड़ी चुनौती है।
रामजी गौतम का कार्यकाल समाप्त होने के बाद राज्यसभा में भी पार्टी की मौजूदा उपस्थिति खत्म हो जाएगी। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी दल का संसद में सदस्य न होना अपने आप राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता समाप्त कर देता है। राष्ट्रीय दल की मान्यता चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित वैधानिक मानदंडों के आधार पर तय होती है। इसलिए बसपा के राष्ट्रीय दर्जे का भविष्य उसके आगामी चुनावी प्रदर्शन और संबंधित नियमों के तहत उसकी पात्रता पर निर्भर करेगा।
आगामी चुनाव होंगे अहम
बसपा की स्थापना 1984 में कांशीराम ने की थी और मायावती लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में पार्टी का प्रमुख चेहरा रही हैं। अब पार्टी की रणनीति आगामी विधानसभा चुनावों में अपने जनाधार को बनाए रखने और चुनावी प्रदर्शन को मजबूत करने पर केंद्रित है। आने वाले चुनावों के परिणाम यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि पार्टी भविष्य में राज्य की विधानसभाओं और संसद में अपना प्रतिनिधित्व किस तरह वापस हासिल करती है।
इस बीच चुनाव आयोग लगातार राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों की मान्यता तथा चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मामलों का प्रबंधन करता है। आयोग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार राजनीतिक दलों की मान्यता और उससे जुड़े प्रावधान निर्धारित कानूनी ढांचे के तहत संचालित होते हैं।
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