काठमांडू।
नेपाल में हाल ही में आई भीषण फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) ने हिमालयी राष्ट्र में तबाही के ऐसे निशान छोड़े हैं, जिससे पूरा प्रशासनिक तंत्र चरमरा गया है। मध्य और दक्षिणी नेपाल में भोटे कोशी, त्रिशूली और नारायणी नदी के लगभग 200 किलोमीटर लंबे मार्ग पर स्थिति अत्यंत भयावह हो गई है। बाढ़ के कारण जान गंवाने वाले लोगों की संख्या इतनी अधिक है कि इस पूरे क्षेत्र के मुर्दाघर पूरी तरह भर चुके हैं और अब वहां शवों को रखने की जगह नहीं बची है।
हालात की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जैसे-जैसे नदियों के निचले इलाकों में शव मिल रहे हैं, प्रशासन को मजबूरी में उन्हें एक जिले से दूसरे जिले में स्थानांतरित करना पड़ रहा है। कई स्थानों पर सरकारी दफ्तरों और सामुदायिक केंद्रों को अस्थायी मुर्दाघरों में तब्दील कर दिया गया है। नदियों का उफान केवल नेपाल तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर भारतीय सीमा तक भी पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश के महाराजगंज और कुशीनगर जिलों में गंडक नदी से अब तक सात अज्ञात शव बरामद किए जा चुके हैं। महाराजगंज में सशस्त्र सीमा बल के जवानों ने कड़ी मशक्कत के बाद चार शवों को नदी से निकाला, जबकि कुशीनगर के छितौनी तटबंध के पास से तीन शव मिले हैं।
नेपाल सरकार ने शवों की तलाश और उनके प्रबंधन के लिए रसुवा से लेकर चितवन तक सैकड़ों सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया है। गृह मंत्रालय की संयुक्त प्रवक्ता रमा आचार्य सुबेदी ने बताया कि प्रशासन विभिन्न जिलों के बीच समन्वय स्थापित कर रहा है ताकि शवों की पहचान और उनके सुरक्षित रख-रखाव को सुनिश्चित किया जा सके। सबसे गंभीर संकट चितवन जिले में देखा जा रहा है, जो भारतीय सीमा के काफी करीब है। यहां नारायणी नदी के किनारे से अब तक 221 शव बरामद किए गए हैं। चितवन के अस्पतालों में केवल 30 से 50 शव रखने की ही क्षमता थी, जिसके कारण भरतपुर में एक सरकारी इमारत को अस्थायी केंद्र बनाया गया है। यहां शवों को सड़ने से बचाने के लिए एयरकंडीशनर और ड्राई आइस का प्रबंध किया गया है।
चितवन के मुख्य जिला अधिकारी गणेश अर्याल के अनुसार, बरामद किए गए अधिकांश शव काफी क्षत-विक्षत अवस्था में हैं, जिससे उनकी पहचान करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। उन्होंने बताया कि अगर वर्तमान अस्थायी केंद्र भी भर जाता है, तो प्रशासन देवघाट के इलेक्ट्रिक श्मशान घाट को विकल्प के रूप में इस्तेमाल करेगा। इसी तरह की समस्या पोखरा और अन्य शहरों में भी देखी जा रही है। धाडिंग, गोरखा और तनहुन जैसे जिलों से 102 शवों को फोरेंसिक जांच के लिए पोखरा भेजा गया है, जबकि वहां के मुर्दाघरों की कुल क्षमता मात्र 88 है।
कास्की के मुख्य जिला अधिकारी कुमान सिंह गुरुंग ने स्वीकार किया कि शवों की संख्या उनकी क्षमता से अधिक हो चुकी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि उपलब्ध सुविधाओं में शवों को अधिकतम दो सप्ताह तक ही सुरक्षित रखा जा सकता है, क्योंकि वहां लंबे समय तक भंडारण के लिए आवश्यक ‘सब-जीरो’ तापमान वाली मशीनें उपलब्ध नहीं हैं। नेपाल का गृह मंत्रालय अब रसुवा, नुवाकोट और नवलपरासी जैसे जिलों के प्रशासन के साथ मिलकर इस मानवीय संकट को संभालने का प्रयास कर रहा है। आपदा के इस समय में शवों का सम्मानजनक प्रबंधन और उनकी पहचान करना प्रशासन के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है।
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