लखनऊ।
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड समेत अन्य राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर अपनी कमर कस ली है। पार्टी के प्रदर्शन को सुधारने और संगठन में नई जान फूंकने के उद्देश्य से उन्होंने आगामी तीन सितंबर को लखनऊ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय स्तरीय बैठक बुलाई है। इस बैठक में देशभर से पार्टी के बड़े पदाधिकारियों को आमंत्रित किया गया है, ताकि चुनावी तैयारियों को धार दी जा सके।
यह महत्वपूर्ण बैठक राजधानी लखनऊ के माल एवेन्यू स्थित बसपा के प्रदेश मुख्यालय में सुबह 10 बजे शुरू होगी। पार्टी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, मायावती इस बैठक में संगठन की मजबूती और जनाधार बढ़ाने के लिए किए गए कार्यों की विस्तृत समीक्षा करेंगी। इस दौरान चुनावी रणनीति को लेकर कुछ कड़े और अहम फैसले लिए जाने की भी संभावना है। बैठक की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें सभी राज्यों के प्रभारियों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के सभी मंडलों और जिलों के प्रमुख पदाधिकारियों को अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए हैं।
मायावती की इस पहल को पार्टी की खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। बैठक के एजेंडे में केवल संगठन की समीक्षा ही नहीं, बल्कि आने वाले समय में होने वाले बड़े आयोजनों की रूपरेखा भी शामिल है। नौ अक्टूबर को बसपा के संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि है। इस अवसर पर मायावती राजधानी लखनऊ में एक विशाल जनसभा आयोजित करने की तैयारी में हैं। इस रैली के माध्यम से बसपा अपनी ताकत का प्रदर्शन करना चाहती है, ताकि विरोधियों को कड़ा संदेश दिया जा सके। तीन सितंबर की बैठक में इस रैली में भारी भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी भी पदाधिकारियों को सौंपी जाएगी।
इसके अतिरिक्त, अगले वर्ष 15 जनवरी को मायावती के जन्मदिवस के अवसर पर मनाए जाने वाले ‘जनकल्याणकारी दिवस’ को लेकर भी चर्चा की जाएगी। पार्टी का लक्ष्य है कि इस बार आर्थिक सहयोग यानी सदस्यता शुल्क और अन्य माध्यमों से जुटाए जाने वाले कोष को पिछले वर्षों की तुलना में अधिक किया जाए। इसके लिए अभी से पदाधिकारियों को लक्ष्य निर्धारित कर काम पर लगाने की योजना है।
वर्तमान में बसपा एक कठिन दौर से गुजर रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका और वह शून्य पर सिमट गई। उत्तर प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद में भी वर्तमान में बसपा का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी का वोट प्रतिशत और सीटों की संख्या नहीं बढ़ी, तो बसपा के ‘राष्ट्रीय पार्टी’ होने का दर्जा भी खतरे में पड़ सकता है। इन्ही चुनौतियों को देखते हुए मायावती ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी किसी भी राज्य में गठबंधन नहीं करेगी और अपने दम पर अकेले ही चुनाव लड़ेगी। उनका मानना है कि गठबंधन से पार्टी को लाभ के बजाय नुकसान उठाना पड़ा है।
अब सबकी नजरें तीन सितंबर को होने वाली इस बैठक पर टिकी हैं, जहां मायावती अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं में नया जोश भरने के साथ-साथ भविष्य की राजनीतिक दिशा तय करेंगी। यह बैठक तय करेगी कि बसपा आगामी चुनौतियों का सामना किस प्रकार करेगी।