SC: जंतर मंतर प्रदर्शन में अपराधियों की घुसपैठ पर दिल्ली पुलिस का खुलासा- छात्र न डरें

नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक (FRS) के इस्तेमाल को लेकर उठे विवाद पर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। पुलिस ने एक विस्तृत हलफनामा दायर कर अदालत को बताया है कि इस तकनीक का उद्देश्य कभी भी शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे छात्रों को निशाना बनाना नहीं था। इसके विपरीत, पुलिस ने इस तकनीक का उपयोग केवल उन असामाजिक तत्वों और पेशेवर अपराधियों की पहचान के लिए किया था, जो छात्रों की भीड़ का फायदा उठाकर बड़ी वारदातों को अंजाम दे सकते थे।

पुलिस ने अदालत को भरोसा दिलाया है कि जिन आम छात्रों या नागरिकों का कोई पिछला आपराधिक इतिहास नहीं है, उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जाएगी। दिल्ली पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) ने स्पष्ट किया है कि उनकी जांच का दायरा केवल उन 2,873 संदिग्धों तक ही सीमित रहेगा, जिनका पुराना और गंभीर रिकॉर्ड पुलिस डेटाबेस में मौजूद है।

अत्याधुनिक तकनीक और मानवीय सत्यापन
अदालत को दी गई जानकारी के अनुसार, पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान मोबाइल FRS यूनिट्स का उपयोग किया था। ये इकाइयां भीड़ में मौजूद चेहरों को स्कैन करती हैं और उनका मिलान पुलिस के उस डेटाबेस से करती हैं जिसमें हत्या, लूट, बलात्कार, अपहरण, पॉक्सो और हथियारों की तस्करी जैसे संगीन जुर्मों के आरोपियों का रिकॉर्ड होता है। पुलिस ने साफ किया कि इसमें ट्रैफिक चालान या छोटे-मोटे नियमों को तोड़ने वाले लोगों का डेटा शामिल नहीं किया गया था।

महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस केवल मशीन की पहचान पर निर्भर नहीं थी। यदि सिस्टम किसी व्यक्ति को संदिग्ध बताता था, तो मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारी भौतिक रूप से उसकी पुष्टि (फील्ड वेरिफिकेशन) करते थे। यह सावधानी इसलिए बरती गई ताकि किसी निर्दोष छात्र को अनावश्यक परेशानी न हो।

जंतर-मंतर प्रदर्शन में अपराधियों की सक्रियता के आंकड़े
• FRS द्वारा पहचाने गए संदिग्ध: 2,873
• क्राइम रिकॉर्ड में पहले से मौजूद: 2,402
• पुलिस डोजियर में शामिल संदिग्ध: 471
• 10 से ज्यादा मामलों वाले अपराधी: 92
• पुलिस के घोषित हिस्ट्रीशीटर: 47

अपराध की आड़ में प्रदर्शन
पुलिस जांच के आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ है कि छात्रों के आंदोलन के दौरान अपराधियों ने भी अपनी जड़ें जमा ली थीं। 20 से 26 जुलाई के बीच प्रदर्शन स्थल और उसके आसपास के क्षेत्र में अपराधों में बढ़ोतरी देखी गई। इस दौरान वाहन चोरी के 7, सामान्य चोरी के 67 और सामान गुम होने के 123 मामले दर्ज किए गए। इन आंकड़ों के माध्यम से पुलिस ने अदालत को यह समझाने का प्रयास किया है कि भीड़ की निगरानी सुरक्षा की दृष्टि से कितनी अनिवार्य थी।

गोपनीयता और डेटा सुरक्षा पर जवाब
हलफनामे में पुलिस ने उन अफवाहों का भी पुरजोर खंडन किया है जिनमें दावा किया गया था कि आम लोगों का बायोमेट्रिक डेटा इकट्ठा कर निजी कंपनियों को बेचा जा रहा है या निजी पहचान पत्रों के आधार पर प्रदर्शनकारियों को समन भेजे जा रहे हैं। पुलिस ने इसे भ्रामक प्रचार बताया और कहा कि केवल गंभीर अपराधियों का डेटा ही नियमों के अनुसार राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के पास सुरक्षित रखा जाता है।

दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन के दौरान सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और पुलिस बल पर हमला करने वाले लोगों के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाने के लिए सीसीटीवी, बॉडी कैमरा और आधिकारिक वीडियोग्राफी का सहारा लिया गया है। इन वीडियो साक्ष्यों का उपयोग केवल दोषियों की पहचान और न्यायपूर्ण कानूनी प्रक्रिया के लिए किया जाएगा। अदालत अब इस हलफनामे के आधार पर मामले की अगली सुनवाई करेगी।

 

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