बेंगलुरु। भारत के प्रतिष्ठित अंतरिक्ष संस्थान ‘इसरो’ (ISRO) में इन दिनों बड़ी प्रशासनिक और तकनीकी हलचल मची हुई है। पिछले एक साल के दौरान संस्थान के कई वरिष्ठ वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा पद छोड़ने की बढ़ती घटनाओं ने केंद्र सरकार की चिंता बढ़ा दी है। अंतरिक्ष विभाग (DoS) में मची इस उथल-पुथल को थामने के लिए सरकार ने अब बेहद कड़ा रुख अपनाया है। वैज्ञानिकों के इस तरह अचानक संस्थान छोड़कर निजी क्षेत्र की कंपनियों में जाने से रोकने के लिए एक नया और सख्त निर्देश जारी किया गया है।
नए प्रावधानों के तहत अब किसी भी वरिष्ठ वैज्ञानिक या तकनीकी विशेषज्ञ का इस्तीफा स्थानीय या केंद्र स्तर पर सीधे स्वीकार नहीं किया जाएगा। अंतरिक्ष विभाग ने स्पष्ट किया है कि ‘ग्रुप ए’ श्रेणी के वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारियों के इस्तीफे या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के अनुरोधों को अब रूटीन प्रक्रिया के तहत मंजूरी नहीं मिलेगी। ऐसे हर मामले को अंतिम निर्णय के लिए अनिवार्य रूप से मुख्यालय भेजा जाएगा। सरकार का मानना है कि गगनयान और चंद्रयान-3 जैसी राष्ट्रीय महत्व की बड़ी परियोजनाओं के बीच में वैज्ञानिकों का इस तरह जाना मिशन की सफलता और समयसीमा पर बुरा असर डाल रहा है।
वैज्ञानिकों के पलायन को रोकने के लिए 14 जुलाई को एक आंतरिक आधिकारिक ज्ञापन (मेमोरेंडम) जारी किया गया है। इसमें संस्थान के विभिन्न केंद्रों के निदेशकों को कड़े निर्देश दिए गए हैं कि जब तक कोई महत्वपूर्ण अंतरिक्ष मिशन पूरी तरह संपन्न नहीं हो जाता, तब तक वे अपनी स्तर पर किसी भी इस्तीफे को हरी झंडी न दें। ऐसे मामलों को उचित सिफारिशों और ठोस कारणों के साथ मुख्यालय को अग्रेषित करना होगा, जहाँ उच्च स्तरीय समिति अंतिम फैसला लेगी। इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने इस कदम को एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताया है। उन्होंने तर्क दिया है कि इस व्यवस्था से चल रही परियोजनाओं को अचानक होने वाले तकनीकी और नेतृत्व संबंधी नुकसान से सुरक्षित रखा जा सकेगा।
सूत्रों के मुताबिक, पिछले एक वर्ष में लगभग 100 से 120 वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने इसरो को अलविदा कहा है। इस्तीफा देने वालों में कुछ ऐसे नाम भी शामिल हैं जो देश के सबसे महत्वपूर्ण मिशनों की कमान संभाल रहे थे। उदाहरण के तौर पर विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के एलवीएम-3 प्रोजेक्ट डायरेक्टर विक्टर जोसेफ और यूआर राव सैटेलाइट सेंटर के प्रोजेक्ट डायरेक्टर व चंद्रयान-3 के सिमुलेशन मैनेजर रहे आदित्य रल्लापल्ली जैसे दिग्गजों ने भी निजी राह चुनी है। यद्यपि इस्तीफा देने वालों की संख्या इसरो के कुल साढ़े चौदह हजार से अधिक कर्मचारियों के मुकाबले कम दिखती है, लेकिन चिंता की बात यह है कि ये लोग संस्थान के सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक केंद्रों से जुड़े थे।
संस्थान के भीतर सबसे बड़ा असर यूआर राव सैटेलाइट सेंटर पर पड़ा है, जहाँ के 1,339 कर्मचारियों में से करीब 80 लोग नौकरी छोड़ चुके हैं। इसी तरह विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर से भी पिछले वित्त वर्ष में कम से कम 20 वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दिया है। वैज्ञानिकों के इस पलायन के पीछे का मुख्य कारण भारत में तेजी से बढ़ता निजी अंतरिक्ष क्षेत्र (प्राइवेट स्पेस सेक्टर) माना जा रहा है। निजी कंपनियां अनुभवी वैज्ञानिकों को आकर्षित करने के लिए भारी-भरकम वेतन और बेहतर सुविधाओं की पेशकश कर रही हैं। इसरो के प्रतिभावान और अनुभवी वैज्ञानिकों की निजी क्षेत्र में बढ़ती मांग ने सरकारी संस्थान के सामने प्रतिभा को सहेजने की एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
इस नई व्यवस्था के लागू होने के बाद अब इसरो के वरिष्ठ कर्मियों के लिए संस्थान छोड़ना पहले जितना सरल नहीं होगा। सरकार की यह सख्ती दर्शाती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र की सर्वोच्चता के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि मिशन की निरंतरता बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक था, लेकिन लंबे समय में इसरो को अपनी कार्यसंस्कृति और वेतन संरचना में भी बदलाव करने पड़ सकते हैं ताकि वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी श्रेष्ठ प्रतिभाओं को बचाए रख सके।
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