नई दिल्ली। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़े फेरबदल के संकेत मिल रहे हैं। शिवसेना के दो धुर विरोधी गुटों, जिनका नेतृत्व एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे कर रहे हैं, के बीच सुलह की सुगबुगाहट तेज हो गई है। दोनों ही पक्षों के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इस बात पर जोर दिया है कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए इन दोनों धड़ों को अब एक साथ आ जाना चाहिए। इन नेताओं का मानना है कि साझा दुश्मन के तौर पर भाजपा से उनके वजूद को खतरा पैदा हो गया है, जिसे रोकने के लिए पुरानी कड़वाहट भुलाकर एकजुट होना समय की मांग है।
शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता अंबादास दानवे ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए भाजपा पर तीखा हमला बोला है। दानवे का कहना है कि भाजपा योजनाबद्ध तरीके से शिवसेना को पूरी तरह खत्म करने की कोशिश कर रही है। अपनी बात को पुख्ता करने के लिए उन्होंने एक मिसाल देते हुए कहा कि जिस तरह समुद्र में बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है, वैसी ही स्थिति भाजपा क्षेत्रीय दलों के साथ पैदा कर रही है। उनके अनुसार, भाजपा की विस्तारवादी नीतियों के कारण अब शिवसेना के सामने अपने मूल अस्तित्व को बचाने का संकट खड़ा हो गया है।
इसी सुर में सुर मिलाते हुए एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के कद्दावर नेता अब्दुल सत्तार ने भी अपनी चिंताएं साझा की हैं। सत्तार ने कहा कि भाजपा के प्रति यह असुरक्षा की भावना दोनों गुटों के भीतर व्याप्त है। उन्होंने कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि भाजपा ने उद्धव ठाकरे गुट के तो केवल हाथ-पैर काटे हैं, लेकिन छत्रपति संभाजीनगर जैसे महत्वपूर्ण जिले में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का सीधा ‘सिर’ ही काट दिया है। उनका इशारा उन क्षेत्रों की ओर था जहां भाजपा अपनी पैठ मजबूत करने के लिए शिवसेना के प्रभाव को कम कर रही है।
अंबादास दानवे से जब यह पूछा गया कि क्या दोनों पार्टियों को फिर से एक हो जाना चाहिए, तो उन्होंने स्वीकार किया कि कई मौकों पर उन्हें व्यक्तिगत रूप से ऐसा महसूस हुआ है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल उनके अकेले के चाहने से इस दिशा में बदलाव संभव नहीं है, इसके लिए दोनों गुटों के शीर्ष नेतृत्व को इच्छाशक्ति दिखानी होगी।
दूसरी ओर, अब्दुल सत्तार ने गठबंधन की राजनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि हमारा ‘बड़ा भाई’ कहलाने वाला दल ही हमें राजनीतिक रूप से समाप्त करने की कोशिश कर रहा है, तो ऐसे साथ रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता। उनका स्पष्ट संकेत शिवसेना और भाजपा के वर्तमान गठबंधन की ओर था। सत्तार ने खुलकर कहा कि यदि एकनाथ शिंदे यह तय कर लें कि दोनों गुटों को फिर से एक साथ आना चाहिए, तो इस एकीकरण की प्रक्रिया में तनिक भी देरी नहीं होगी।
नेताओं के ये बयान महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे रहे हैं। लंबे समय से एक-दूसरे के खिलाफ कानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे इन दोनों गुटों का भाजपा के खिलाफ साझा रुख अपनाना, भविष्य के बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत हो सकता है। फिलहाल दोनों पक्षों के मुख्य नेताओं की ओर से आधिकारिक तौर पर विलय या गठबंधन की कोई बात नहीं कही गई है, लेकिन जिस तरह से दोनों गुटों के बड़े नेता भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं, उससे आगामी चुनावों से पहले नए समीकरण बनने की संभावनाओं को बल मिल रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ‘अस्तित्व के खतरे’ का यह तर्क उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे को एक मेज पर ला पाएगा।
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