कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर एक बड़े राजनीतिक तूफान के संकेत मिल रहे हैं। हाल ही में सामने आए ‘हस्ताक्षर विवाद’ ने पार्टी के भीतर गहरी गुटबाजी और असंतोष को उजागर कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में इस समय सबसे बड़ी चर्चा पार्टी से निष्कासित दो प्रमुख विधायकों, ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को लेकर है। सूत्रों का दावा है कि तृणमूल कांग्रेस के लगभग 50 विधायक इन दोनों बागी नेताओं के निरंतर संपर्क में हैं, जिससे पार्टी के भीतर एक नया और शक्तिशाली शक्ति केंद्र उभरने की संभावना प्रबल हो गई है।
इस पूरे विवाद की जड़ वह शिकायत है जिसमें आरोप लगाया गया था कि विपक्ष के नेता के समर्थन से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर कुछ विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए विधानसभा सचिवालय ने एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई, जिसकी जांच वर्तमान में सीआईडी (CID) द्वारा की जा रही है। जैसे ही पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने इस प्रकरण में ऋतब्रत और संदीपन की भूमिका पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए, पार्टी ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों को ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के आरोप में निष्कासित कर दिया। हालांकि, यह निष्कासन विवाद को शांत करने के बजाय और भड़काता नजर आ रहा है।
अपुष्ट खबरों और राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, हाल ही में कोलकाता के एक गुप्त स्थान पर इन असंतुष्ट विधायकों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में शामिल हुए विधायकों के बीच इस बात पर चर्चा हुई कि वे स्वयं को ‘वास्तविक तृणमूल’ के रूप में स्थापित करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को एक औपचारिक प्रस्ताव सौंप सकते हैं। यदि यह योजना हकीकत में बदलती है, तो यह पार्टी के आधिकारिक ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। इस संभावित बागी गुट का मुख्य चेहरा ऋतब्रत बनर्जी को बनाए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं। विशेष बात यह है कि इस कथित समूह में पार्टी के पुराने और वरिष्ठ दिग्गजों के नाम शामिल नहीं हैं, जिससे यह पूरी तरह से एक नया मोर्चा नजर आ रहा है।
विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम तृणमूल कांग्रेस के भीतर लंबे समय से पनप रहे आंतरिक कलह का नतीजा है। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी के भीतर सत्ता संतुलन और निर्णयों को लेकर असंतोष बढ़ रहा था, जिसे अब जाली हस्ताक्षर मामले ने हवा दे दी है। यदि सच में 50 विधायक एक साथ अलग रुख अपनाते हैं, तो ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए न केवल सदन के भीतर बल्कि राजनीतिक धरातल पर भी बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
फिलहाल, तृणमूल कांग्रेस का आधिकारिक नेतृत्व इन खबरों को सिरे से खारिज कर रहा है और पार्टी की एकजुटता का दावा कर रहा है। लेकिन पर्दे के पीछे की गतिविधियां कुछ और ही संकेत दे रही हैं। सीआईडी की जांच के निष्कर्ष और आने वाले कुछ दिनों में इन बागी विधायकों का अगला कदम बंगाल की भावी राजनीति की दिशा तय करेगा। राज्य की जनता और राजनीतिक पंडितों की नजरें अब विधानसभा के गलियारों पर टिकी हैं कि क्या वास्तव में कोई नया दल या गुट उभर कर सामने आता है या फिर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस विद्रोह को कुचलने में सफल होती हैं। फिलहाल, बंगाल की राजनीति में एक बड़े नाटकीय मोड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
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