कर्णप्रयाग। उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित कर्णप्रयाग, आदिबदरी और गौचर की पहाड़ियां इन दिनों वनाग्नि की भीषण चपेट में हैं। जंगलों में लगी आग रुकने का नाम नहीं ले रही है, जिससे न केवल बेशकीमती वन संपदा खाक हो रही है, बल्कि अब यह संकट आम जनजीवन और स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। फरवरी माह से शुरू हुआ आग लगने का यह सिलसिला बीच में हुई छिटपुट वर्षा के कारण कुछ समय के लिए थम गया था, लेकिन मई की बढ़ती तपिश ने स्थिति को दोबारा भयावह बना दिया है।
वनाग्नि की इन घटनाओं का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसकी चपेट में आकर स्थानीय लोगों, विशेषकर घास और चारे के लिए जंगल जाने वाली महिलाओं के झुलसने और असमय मौत के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। इस स्थिति ने स्थानीय निवासियों के भीतर भारी रोष पैदा कर दिया है। लोग अब वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। आरोप है कि विभाग की लापरवाही और सुस्त रवैये के कारण आग पर समय रहते काबू नहीं पाया जा सका। साथ ही, जंगलों में जानबूझकर आग लगाने वाले अराजक तत्वों पर नियंत्रण पाने में भी प्रशासन विफल साबित हो रहा है, जिससे क्षेत्र में प्रभावी कदम उठाने की मांग जोर पकड़ रही है।
आग की तपिश के साथ-साथ पहाड़ों से उठ रहे धुएं ने वायु प्रदूषण को खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया है। कर्णप्रयाग के कपीरी, गौचर, सिरण और आदिबदरी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली बूंगा व उज्ज्वलपुर की पहाड़ियां दिनभर धुएं के गुबार से ढकी रहती हैं। यद्यपि बुधवार को आग की लपटें कुछ कम दिखाई दीं, लेकिन हवा में तैरती राख और कालिख ने लोगों का सांस लेना दूभर कर दिया है। पहाड़ों की शुद्ध हवा अब जहरीली हो चुकी है, जिसका सीधा असर फेफड़ों और आंखों पर पड़ रहा है। धुएं के कारण जलस्रोत भी प्रदूषित हो गए हैं, जिससे पानी की शुद्धता पर संकट खड़ा हो गया है।
वायु और जल प्रदूषण का असर अब स्थानीय अस्पतालों में बढ़ती मरीजों की भीड़ के रूप में दिखाई दे रहा है। उप जिला चिकित्सालय कर्णप्रयाग में इन दिनों मरीजों का भारी दबाव है। अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन मौसमी बुखार के मरीजों की संख्या 150 से 200 तक पहुंच गई है। इसके अतिरिक्त, दूषित पानी के सेवन से जलजनित रोगों जैसे टायफाइड और पीलिया के मामलों में भी चिंताजनक वृद्धि देखी जा रही है। नेत्र रोगों, श्वास संबंधी समस्याओं और त्वचा की एलर्जी से पीड़ित लोग बड़ी संख्या में अस्पताल पहुंच रहे हैं।
स्वास्थ्य की इस गंभीर स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए उप जिला चिकित्सालय के सीएमएस बी.पी. पुरोहित ने बताया कि जंगलों की आग से फैले धुएं के कारण लोग श्वसन संबंधी समस्याओं की शिकायत लेकर अधिक आ रहे हैं। उन्होंने जनता को परामर्श दिया है कि इस दूषित वातावरण से बचने के लिए बाहर निकलते समय मास्क का अनिवार्य रूप से प्रयोग करें ताकि जहरीली हवा फेफड़ों तक न पहुंचे। साथ ही, आंखों को जलन से बचाने के लिए चश्मा पहनने और शरीर को हाइड्रेटेड रखने के लिए अधिक से अधिक तरल पदार्थों का सेवन करने की सलाह दी गई है। वनाग्नि की यह आपदा अब एक गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले रही है, जिसके समाधान के लिए त्वरित और ठोस प्रयासों की आवश्यकता है।
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