नई दिल्ली। देश में महंगाई की मार झेल रही जनता पर शुक्रवार को एक और बड़ा बोझ डाल दिया गया है। तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की भारी बढ़ोतरी करने का एलान किया है। ईंधन के दामों में हुई इस अचानक वृद्धि ने न केवल आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया है, बल्कि देश के राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर दी है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकार को आड़े हाथों लेते हुए तंज कसा है।
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इस वृद्धि के प्रति अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने अपनी पुरानी बात को दोहराते हुए सरकार पर निशाना साधा और जनता को एक प्रतीकात्मक सुझाव भी दिया। अखिलेश यादव ने अपने पोस्ट में लिखा कि उन्होंने पहले ही सचेत किया था कि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में साइकिल से बेहतर कुछ भी नहीं है। उन्होंने एक ग्राफिक साझा करते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि अगर देश और जनता को महंगाई के बोझ से मुक्त होकर आगे बढ़ना है, तो साइकिल ही सबसे व्यावहारिक विकल्प है। उनके इस बयान को सरकार की आर्थिक नीतियों पर एक बड़े कटाक्ष के रूप में देखा जा रहा है।
ईंधन की कीमतों में इस ताजी बढ़ोतरी का असर देश के लगभग सभी बड़े शहरों में दिखाई दे रहा है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में पेट्रोल और डीजल के दाम अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। कई प्रमुख शहरों में पेट्रोल की कीमत 100 रुपये प्रति लीटर के आंकड़े को पार कर गई है, जिससे माल ढुलाई और सार्वजनिक परिवहन की लागत बढ़ना तय माना जा रहा है। आम उपभोक्ताओं का कहना है कि पेट्रोल-डीजल महंगा होने से रसोई के बजट से लेकर अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी सीधा प्रभाव पड़ेगा।
अखिलेश यादव का हमला केवल तेल की कीमतों तक ही सीमित नहीं रहा। उन्होंने उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति और योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल में हो रही देरी को लेकर भी सरकार को घेरा। उत्तर प्रदेश में मंत्रियों के चयन के बाद भी विभागों के बंटवारे में हो रहे विलंब पर सवाल उठाते हुए उन्होंने तंज कसा कि क्या अब मंत्रियों के विभागों की ‘पर्ची’ भी ऊपर (दिल्ली) से आएगी? अखिलेश यादव का यह बयान भाजपा के भीतर चल रही सांगठनिक प्रक्रियाओं और निर्णय लेने की शक्ति के केंद्रीकरण की ओर इशारा करता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव एक साथ दो मोर्चों पर सरकार की घेराबंदी कर रहे हैं। एक ओर जहां वे महंगाई जैसे जनसरोकारी मुद्दों को उठाकर जनता के बीच अपनी पैठ मजबूत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक और सांगठनिक फैसलों में देरी को मुद्दा बनाकर सरकार की कार्यकुशलता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। विपक्ष के इन तीखे तेवरों के बीच सरकार की ओर से फिलहाल कोई बड़ी राहत मिलने के संकेत नहीं मिले हैं। ईंधन की कीमतों में हुई इस वृद्धि ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता का बोझ सीधे जनता पर डालना उचित है। फिलहाल, जनता महंगाई की इस नई लहर से त्रस्त है और विपक्षी दल इसे आने वाले चुनावों में एक बड़ा हथियार बनाने की तैयारी में हैं।