लखनऊ। उत्तर प्रदेश भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण (यूपी रेरा) ने घर और दुकान खरीदने वाले हजारों आवंटियों को बड़ी राहत देते हुए एक ऐतिहासिक बदलाव किया है। अब प्रदेशभर के गैर पंजीकृत प्रमोटर भी सीधे तौर पर यूपी रेरा के दायरे में आ गए हैं। रियल एस्टेट अधिनियम 2016 की धारा 85 के तहत किया गया यह महत्वपूर्ण संशोधन 25 मार्च से प्रभावी हो गया है। इस निर्णय के बाद अब उन परियोजनाओं के खरीदार भी न्याय के लिए रेरा का दरवाजा खटखटा सकेंगे, जिन्हें प्रमोटरों ने जानबूझकर पंजीकृत नहीं कराया था।
अब तक यूपी रेरा मुख्य रूप से उन्हीं मामलों की सुनवाई करता था जो उसके पास पंजीकृत थे। इसके कारण अपंजीकृत प्रोजेक्ट्स में निवेश करने वाले लोग खुद को असहाय महसूस कर रहे थे। यूपी रेरा के अध्यक्ष संजय भूसरेड्डी के अनुसार, सामान्य विनियम 2019 में किए गए इस 10वें संशोधन का उद्देश्य रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाना और खरीदारों के हितों की रक्षा करना है। नए नियमों के तहत अब अपंजीकृत परियोजनाओं के आवंटी कब्जा पाने, प्रतिपूर्ति या अन्य कानूनी राहत के लिए वाद दाखिल कर सकेंगे।
शिकायत दर्ज करने के लिए यूपी रेरा के पोर्टल पर जल्द ही विशेष सुविधा विकसित की जाएगी, जहाँ आवंटी फार्म-एम के माध्यम से अपनी शिकायत दर्ज करा सकेंगे। रेरा की संबंधित बेंच सबसे पहले यह तय करेगी कि संबंधित परियोजना को पंजीकरण से छूट प्राप्त थी या नहीं। यदि बेंच यह निष्कर्ष निकालती है कि परियोजना का पंजीकरण अनिवार्य था, तो वह प्रमोटर के खिलाफ आवश्यक कार्यवाही के लिए मामला सचिव को भेजेगी। इसके बाद मामले के गुण-दोष के आधार पर आवंटी को उचित राहत प्रदान की जाएगी।
नियमों में बदलाव के साथ ही प्रशासनिक और प्रोसेसिंग शुल्क की सीमा भी स्पष्ट रूप से तय कर दी गई है। यदि किसी आवंटी की मृत्यु हो जाती है और संपत्ति परिवार के ही किसी सदस्य या कानूनी उत्तराधिकारी को हस्तांतरित होती है, तो प्रमोटर अधिकतम 1,000 रुपये की प्रोसेसिंग फीस ही ले सकेगा। परिवार से बाहर किसी अन्य व्यक्ति को संपत्ति हस्तांतरित करने की स्थिति में यह शुल्क अधिकतम 25,000 रुपये निर्धारित किया गया है। खास बात यह है कि ऐसे मामलों में नया विक्रय अनुबंध करने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि मौजूदा दस्तावेजों में ही आवश्यक परिवर्तन दर्ज कर प्रमोटर अपने रिकॉर्ड अपडेट करेगा।
उल्लेखनीय है कि यूपी रेरा में पहले से ही करीब 50 हजार से अधिक मुकदमे लंबित हैं। संस्था के कामकाज को लेकर सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की थी और इसे सेवानिवृत्त नौकरशाहों का पुनर्वास केंद्र बताया था। इस नए संशोधन से यूपी रेरा पर काम का बोझ और बढ़ना तय है, लेकिन उपभोक्ताओं के लिए यह न्याय की एक बड़ी उम्मीद लेकर आया है। अब तक एक विशेष बेंच केवल रिफंड के मामलों को सुनती थी, लेकिन अब पंजीकृत आवंटियों की तरह ही अपंजीकृत योजनाओं के खरीदारों की भी व्यापक सुनवाई संभव हो सकेगी।