नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच ईरान ने एक बड़ा और चौंकाने वाला कदम उठाते हुए हिंद महासागर में स्थित अमेरिका और ब्रिटेन के साझा सैन्य अड्डे ‘डिएगो गार्सिया’ पर लंबी दूरी की मिसाइलों से हमला करने की कोशिश की है। ईरान की इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि अब यह संघर्ष केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका भूगोल काफी व्यापक हो चुका है। वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि ईरान के तट से करीब 4,000 किलोमीटर दूर स्थित इस सामरिक बेस को निशाना बनाने के लिए दो मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं।
ईरान द्वारा की गई यह अब तक की सबसे लंबी दूरी के हमले की कोशिश मानी जा रही है। हालांकि, राहत की बात यह रही कि दोनों में से कोई भी मिसाइल अपने लक्ष्य पर नहीं लग सकी। रिपोर्ट के अनुसार, एक मिसाइल उड़ान के दौरान ही तकनीकी खराबी के कारण गिर गई, जबकि दूसरी मिसाइल को रोकने के लिए अमेरिकी नौसेना के एक डिस्ट्रॉयर ने एसएम-3 इंटरसेप्टर का प्रयोग किया। यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि इंटरसेप्टर मिसाइल को नष्ट करने में सफल रहा या नहीं, लेकिन इस घटना ने वाशिंगटन और उसके सहयोगी देशों की नींद उड़ा दी है।
ईरान की इस सैन्य क्षमता ने रक्षा विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है। अब तक ईरान सार्वजनिक रूप से अपनी मिसाइलों की मारक क्षमता केवल 2,000 किलोमीटर तक होने का दावा करता रहा है, लेकिन 3,800 किलोमीटर से अधिक दूर स्थित डिएगो गार्सिया पर हमले की कोशिश ने इस दावे को झुठला दिया है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इस हमले में ‘खोर्रमशहर-4’ श्रेणी की मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया है। यह लिक्विड-फ्यूल वाली मिसाइल है जो एक टन से ज्यादा वजन का वॉरहेड ले जाने में सक्षम है। इसकी मारक क्षमता सैद्धांतिक रूप से 4,000 किलोमीटर से भी अधिक हो सकती है, जिसका अर्थ है कि अब लंदन और पेरिस जैसे यूरोपीय शहर भी इसकी पहुंच में आ सकते हैं।
डिएगो गार्सिया हिंद महासागर के चागोस द्वीपसमूह में स्थित है और इसे दुनिया के सबसे सुरक्षित व रणनीतिक सैन्य ठिकानों में से एक माना जाता है। यह बेस अमेरिका और ब्रिटेन के लिए एशिया, अफ्रीका और खाड़ी देशों में सैन्य ऑपरेशनों के लिए एक महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स हब के रूप में काम करता है। अफगानिस्तान और इराक युद्ध के दौरान इसी बेस से भारी बमवर्षक विमानों ने उड़ान भरी थी। पारंपरिक रूप से इस बेस को युद्ध क्षेत्रों से काफी दूर और सुरक्षित माना जाता था, लेकिन ईरान के इस कदम ने सुरक्षा की इस पुरानी धारणा को बड़ी चुनौती दे दी है। नाटो देशों के लिए भी यह एक बड़ा संकेत है कि ईरान अब केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि अंतरमहाद्वीपीय स्तर पर वार करने की क्षमता विकसित कर चुका है।
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