नई दिल्ली। भारत के न्यायिक इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील अध्याय जुड़ गया है। उच्चतम न्यायालय ने देश में पहली बार ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु के व्यावहारिक कार्यान्वयन को मंजूरी दे दी है। यह ऐतिहासिक निर्णय पिछले 13 वर्षों से कोमा में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे गाजियाबाद के निवासी हरीश राणा के मामले में आया है। न्यायालय ने मानवीय संवेदनाओं और व्यक्ति की गरिमा को सर्वोपरि रखते हुए हरीश राणा को जीवन-रक्षक प्रणालियों से मुक्ति दिलाने का आदेश दिया है। यह फैसला भारतीय न्यायपालिका द्वारा 2018 में सुनाए गए ‘कॉमन कॉज’ निर्णय की दिशा में पहला ठोस कदम है, जिसमें ‘गरिमा के साथ मरने के मौलिक अधिकार’ को संवैधानिक मान्यता दी गई थी।
एक होनहार छात्र से बिस्तर तक का सफर
हरीश राणा की कहानी संघर्ष, पीड़ा और एक परिवार की बेबसी की दास्तां है। 2013 से पहले हरीश राणा एक अत्यंत प्रतिभाशाली और पढ़ाई-लिखाई में अग्रणी युवक था। उसकी आंखों में बड़े सपने थे, लेकिन एक हादसे ने सब कुछ बदल कर रख दिया। साल 2013 में चंडीगढ़ में अपने पेइंग गेस्ट हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उसे गंभीर ब्रेन इंजरी (मस्तिष्क की चोट) हुई। इस हादसे ने उसे ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ में धकेल दिया। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति की आंखें तो खुली रह सकती हैं, लेकिन वह पूरी तरह से अचेत होता है और अपने आसपास के वातावरण के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाता। हरीश राणा का शरीर 100 प्रतिशत ‘क्वाड्रिप्लेजिक’ हो गया था, जिसका अर्थ है कि उसके शरीर के चारों अंगों ने काम करना बंद कर दिया था।
तेरह वर्षों का नारकीय जीवन
पिछले 13 वर्षों से हरीश राणा मशीनों और ट्यूबों के सहारे जीवित था। उसकी सांसें ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब के माध्यम से चल रही थीं, जबकि पोषण के लिए उसके पेट में पीईजी ट्यूब लगाई गई थी। इसे चिकित्सा भाषा में ‘क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन’ (CAN) कहा जाता है। इतने लंबे समय तक बिस्तर पर रहने के कारण उसके शरीर पर बड़े-बड़े बेड सोर्स (जख्म) हो गए थे। मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार, हरीश राणा की स्थिति में सुधार की रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं बची थी। वह केवल जैविक रूप से जीवित था, लेकिन एक मनुष्य के रूप में उसका अस्तित्व समाप्त हो चुका था।
कानूनी लड़ाई और माता-पिता की गुहार
अपने जवान बेटे को तिल-तिल मरते देखना माता-पिता के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था। वर्षों तक इलाज कराने और हर संभव कोशिश करने के बाद जब कोई उम्मीद नहीं बची, तो उसके पिता ने भारी मन से न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। साल 2024 में पहले यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा, लेकिन वहां से उन्हें कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में आया। सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्काल कार्रवाई की और एम्स (AIIMS) के विशेषज्ञों को शामिल करते हुए प्राइमरी और सेकंडरी मेडिकल बोर्ड का गठन किया।
इन दोनों मेडिकल बोर्डों ने हरीश राणा की स्थिति की गहन जांच की और एकमत होकर रिपोर्ट दी कि उसकी स्थिति अपरिवर्तनीय है। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि इलाज जारी रखना केवल उसकी जैविक पीड़ा को लंबा खींचना है, जिससे उसे कोई लाभ नहीं मिल रहा। जस्टिस जेबी पारदीवाला ने मेडिकल रिपोर्ट का अवलोकन करते हुए इसे एक अत्यंत दुखद स्थिति बताया और कहा कि किसी भी व्यक्ति को इस तरह की अवस्था में नहीं रखा जा सकता।
न्यायालय के कड़े निर्देश और दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में न केवल हरीश राणा को राहत दी, बल्कि भविष्य के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए। कोर्ट ने आदेश दिया कि हरीश राणा को दिए जा रहे सभी जीवन-रक्षक उपचार, जिसमें कृत्रिम पोषण (CAN) शामिल है, तुरंत प्रभाव से बंद कर दिए जाएं। इसके साथ ही एम्स को निर्देश दिया गया कि वह हरीश राणा को अपने पेलिएटिव केयर सेंटर में भर्ती करे और उसे घर से अस्पताल शिफ्ट करने की पूरी सुविधा प्रदान करे। कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि लाइफ सपोर्ट हटाने की पूरी प्रक्रिया अत्यंत गरिमापूर्ण होनी चाहिए।
इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों को निर्देशित किया है कि वे ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट्स को मेडिकल बोर्ड के फैसलों से अवगत कराएं। केंद्र सरकार को भी यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि प्रत्येक जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) के पास सेकंडरी मेडिकल बोर्ड के लिए पंजीकृत डॉक्टरों का एक पैनल तैयार रहे, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में देरी न हो।
कानून बनाने की सिफारिश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के माध्यम से केंद्र सरकार को एक महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया है। कोर्ट ने कहा कि पैसिव यूथेनेशिया जैसे संवेदनशील और जटिल विषयों पर देश में एक व्यापक और स्पष्ट कानून की आवश्यकता है। हालांकि कोर्ट ने स्वयं पहल करते हुए हरीश राणा के मामले में निर्णय दिया, लेकिन उसने यह भी माना कि भविष्य में ऐसे मामलों के निपटारे के लिए एक वैधानिक तंत्र होना चाहिए।
यह निर्णय न केवल हरीश राणा के परिवार के लिए उस लंबी पीड़ा से मुक्ति का मार्ग है, बल्कि यह उन हजारों मरीजों और परिवारों के लिए भी एक नजीर है जो ऐसी ही असाध्य स्थितियों का सामना कर रहे हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी शामिल है।
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