शिमला। हिमाचल प्रदेश की वित्तीय सेहत और केंद्र सरकार से मिलने वाली महत्वपूर्ण आर्थिक सहायता के भविष्य को लेकर राज्य की राजनीति में एक बड़ी हलचल शुरू हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) की व्यवस्था को समाप्त किए जाने से उत्पन्न हुई गंभीर स्थिति पर गहन मंथन करने के लिए प्रदेश सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार आगामी 17 फरवरी को हिमाचल प्रदेश विधानसभा का एक दिवसीय विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है। इस विशेष सत्र का मुख्य उद्देश्य केंद्र के इस निर्णय से राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों पर चर्चा करना और भविष्य की रणनीति तैयार करना है।
इस महत्वपूर्ण विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए विधानसभा सचिवालय प्रशासन ने राजभवन को औपचारिक प्रस्ताव भेज दिया है। यह प्रस्ताव राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल की अंतिम स्वीकृति के लिए भेजा गया है। संवैधानिक नियमों के अनुसार, विधानसभा का सत्र बुलाने के लिए राज्यपाल की औपचारिक सहमति अनिवार्य होती है। हालांकि, वर्तमान में राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल उत्तर प्रदेश के गोरखपुर प्रवास पर हैं। इस कारण प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर और राजभवन से आधिकारिक मंजूरी मिलने में कुछ समय लग रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि गुरुवार देर शाम तक लोक भवन से इस विशेष सत्र के लिए हरी झंडी मिल जाएगी, जिसके बाद इसकी आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी जाएगी।
विशेष सत्र के आयोजन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां तेज कर दी गई हैं। राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से इस संबंध में एक संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण प्रस्ताव आज ही विधानसभा सचिवालय को प्राप्त हुआ है। इस एक पंक्ति के प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से 17 फरवरी को सत्र आयोजित करने की इच्छा जताई गई है। राज्य प्रशासन का मानना है कि राजस्व घाटा अनुदान का बंद होना हिमाचल जैसे पहाड़ी और सीमित संसाधनों वाले राज्य के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में प्रदेश के सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ इस विषय पर चर्चा करना लोकतंत्र और राज्य हित में आवश्यक हो गया है।
इस विशेष सत्र को बुलाने की पटकथा सोमवार को राज्य सचिवालय में लिखी गई थी। उस दिन मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया के बीच एक लंबी और गंभीर मुलाकात हुई थी। इस बैठक के दौरान राज्य के वित्तीय संसाधनों और केंद्र से मिलने वाली मदद में कटौती के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की गई। दोनों नेताओं के बीच इस बात पर सहमति बनी कि इस विषय की गंभीरता को देखते हुए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाना चाहिए ताकि सदन में विस्तृत चर्चा के माध्यम से राज्य का पक्ष और आगे का मार्ग तय किया जा सके। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस मुद्दे को राज्य की आर्थिकी के लिए जीवन-मरण का प्रश्न माना है, यही वजह है कि बजट सत्र से पहले इस विशेष सत्र की आवश्यकता महसूस की गई।
हिमाचल प्रदेश विधानसभा के इतिहास में विशेष सत्र बुलाने के उदाहरण पहले भी मिलते रहे हैं, लेकिन ऐसे सत्र किसी अत्यंत महत्वपूर्ण या आपातकालीन विषय पर ही बुलाए जाते हैं। इससे पहले, वर्ष 2020 में भी विधानसभा का विशेष सत्र आयोजित किया गया था। उस समय एससी-एसटी आरक्षण से संबंधित एक आवश्यक संवैधानिक संशोधन को स्वीकृति प्रदान करने के लिए 7 जनवरी को सदन की बैठक बुलाई गई थी। उस दौरान बंडारू दत्तात्रेय हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल थे। इसके अलावा भी विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में समय-समय पर महत्वपूर्ण विधायी कार्यों के लिए विशेष सत्रों का सहारा लिया जाता रहा है।
राजस्व घाटा अनुदान हिमाचल प्रदेश के लिए वित्तीय रूप से रीढ़ की हड्डी की तरह रहा है। इसके बंद होने से राज्य के विकास कार्यों और प्रशासनिक खर्चों के लिए फंड जुटाने में बड़ी बाधा आ सकती है। सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच भी जा सकती है, लेकिन उससे पहले सदन के भीतर विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच इस पर होने वाली बहस काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कुलदीप सिंह पठानिया ने भी संकेत दिया है कि विधानसभा सचिवालय इस एक दिवसीय सत्र के सुचारू संचालन के लिए पूरी तरह तैयार है।
अब सबकी नजरें राजभवन से आने वाली औपचारिक मंजूरी पर टिकी हैं। जैसे ही शिव प्रताप शुक्ल की ओर से इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर होंगे, वैसे ही विधानसभा के सभी सदस्यों को सत्र की सूचना भेज दी जाएगी। 17 फरवरी को होने वाला यह सत्र केवल एक चर्चा का मंच नहीं होगा, बल्कि इसके माध्यम से केंद्र सरकार तक राज्य की चिंताओं को पहुंचाने का एक संवैधानिक प्रयास भी होगा। हिमाचल की राजनीति में इस विशेष सत्र को सरकार के एक कड़े तेवर के रूप में भी देखा जा रहा है, जो राज्य के वित्तीय हितों की रक्षा के लिए किसी भी स्तर पर बातचीत और विमर्श के लिए तैयार है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि इस एक दिवसीय सत्र में कौन-कौन से अन्य सुझाव निकलकर सामने आते हैं और राज्य सरकार इस वित्तीय कमी की भरपाई के लिए क्या वैकल्पिक योजना पेश करती है।
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