नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच होने वाली बहुप्रतीक्षित शिखर वार्ता से पहले ताइवान का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। वॉशिंगटन में वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया को संबोधित करते हुए यह साफ कर दिया है कि ताइवान के प्रति अमेरिका की आधिकारिक नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है और न ही निकट भविष्य में ऐसी कोई संभावना है। इस बयान को चीन के लिए एक कड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप और शी चिनफिंग के बीच होने वाली बैठकों में ताइवान हमेशा से चर्चा का एक प्रमुख केंद्र रहा है। हाल के संवादों में भी इस विषय पर गंभीरता से बात हुई है, लेकिन इससे अमेरिका की मौजूदा रणनीतिक स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ा है। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी पुरानी ताइवान नीति का पूरी तरह पालन करता रहेगा। ताइवान की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता अडिग है और इस मामले में दोनों देशों के बीच संवाद की प्रक्रिया निरंतर जारी है।
सशस्त्र सैन्य सहयोग और हथियार सौदों को लेकर भी अमेरिकी अधिकारियों ने महत्वपूर्ण आंकड़े साझा किए। अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने अपने कार्यकाल के पहले वर्ष में ही ताइवान को हथियार बेचने के जितने समझौतों को मंजूरी दी है, वह पिछली ओबामा सरकार के पूरे चार साल के कार्यकाल से कहीं अधिक है। यह ताइवान की सैन्य शक्ति को आधुनिक बनाने में अमेरिका की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है। हालांकि, ताइवान द्वारा हाल ही में पारित अतिरिक्त रक्षा बजट पर अमेरिका ने थोड़ी निराशा भी व्यक्त की है। अधिकारियों का कहना है कि ताइवान ने करीब 24.8 अरब अमेरिकी डॉलर का बजट तो पारित किया है, लेकिन इसमें कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण रक्षा प्रस्तावों को शामिल नहीं किया गया है, जो सुरक्षा की दृष्टि से अनिवार्य थे।
ताइवान की स्थानीय समाचार रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सैन्य उपकरण खरीदने के लिए पारित इस विशाल बजट के माध्यम से ताइवान अपनी रक्षा प्रणालियों को और अधिक मजबूत करना चाहता है। लेकिन अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ताइवान को अपनी सुरक्षा जरूरतों को पूरी तरह संतुलित करने के लिए मूल रक्षा पैकेज के शेष हिस्सों को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।
इधर, अमेरिकी संसद में भी ताइवान के समर्थन में जबरदस्त राजनीतिक एकजुटता देखने को मिल रही है। डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसदों ने एक संयुक्त प्रस्ताव पेश किया है, जिसमें ताइवान के प्रति चीन की बढ़ती आक्रामकता और धमकियों पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। यह प्रस्ताव ठीक उस समय लाया गया है जब ट्रंप और शी चिनफिंग अपनी शिखर वार्ता की तैयारी कर रहे हैं। अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति ने स्पष्ट किया कि यह साझा प्रस्ताव चीन द्वारा पैदा किए जा रहे सुरक्षा और आर्थिक खतरों के प्रति दोनों दलों की एकमत चिंता को दर्शाता है।
इस प्रस्ताव को डेमोक्रेट सांसद जीन शाहीन और क्रिस कून्स के साथ रिपब्लिकन सांसद पीट रिकिट्स ने मिलकर पेश किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि वार्ता से पहले इस प्रकार के बयानों और विधायी प्रस्तावों का उद्देश्य चीन पर कूटनीतिक दबाव बनाना है। अमेरिका ने यह संकेत दे दिया है कि वह ताइवान के लोकतांत्रिक अस्तित्व और उसकी सुरक्षा के मुद्दे पर चीन के साथ किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं है। अब पूरी दुनिया की नजरें ट्रंप और शी चिनफिंग की इस मुलाकात पर टिकी हैं कि क्या दोनों महाशक्तियां इस संवेदनशील मुद्दे पर किसी सहमति तक पहुँच पाती हैं या तनाव और बढ़ेगा।
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