नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के चलते पैदा हुए वैश्विक तेल संकट और आर्थिक दबावों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता से कुछ कड़े कदम उठाने और जीवनशैली में बदलाव करने का आग्रह किया है। प्रधानमंत्री की इन अपीलों पर मुख्य विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी ने पलटवार करते हुए इसे सरकार की आर्थिक विफलता करार दिया है। इस राजनीतिक खींचतान ने देश में एक नई बहस छेड़ दी है कि आर्थिक संकट का समाधान जनता के त्याग में है या सरकार के प्रबंधन में।
तेलंगाना के सिकंदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ (घर से काम करने) की आदतों को दोबारा अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि कोरोना काल के दौरान देश ने ऑनलाइन मीटिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंस जैसी प्रणालियों को सफलतापूर्वक अपनाया था और लोग इनके आदी भी हो गए थे। मोदी के अनुसार, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, ऐसे में यातायात कम करके पेट्रोल-डीजल की बचत करना राष्ट्रीय हित में होगा। इससे देश को अपना कीमती विदेशी मुद्रा भंडार बचाने में मदद मिलेगी।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में विशेष रूप से शादियों के सीजन का जिक्र करते हुए लोगों से अपील की कि वे कम से कम एक साल तक शादियों के लिए सोना खरीदने से परहेज करें। उन्होंने तर्क दिया कि सोने के आयात पर देश का काफी पैसा खर्च होता है। इसके साथ ही उन्होंने खाने के तेल और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को भी कम करने का सुझाव दिया। मोदी ने कहा कि यदि हर परिवार खाने के तेल का इस्तेमाल थोड़ा कम कर दे, तो यह न केवल देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा होगा, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर होगा। उन्होंने किसानों से रासायनिक खादों का प्रयोग आधा करने और प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ने का भी आह्वान किया ताकि धरती और खजाना दोनों सुरक्षित रहें।
प्रधानमंत्री के इन सुझावों पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के जरिए कड़ी आपत्ति जताई। राहुल गांधी ने कहा कि जनता से इस तरह के त्याग मांगना सरकार की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है। उन्होंने लिखा कि प्रधानमंत्री द्वारा सोना न खरीदने, विदेश यात्रा टालने और कम पेट्रोल जलाने जैसे उपदेश यह बताते हैं कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था को संभालने में विफल रही है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि पिछले 12 सालों में देश को ऐसे मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया गया है जहां अब जनता को अपनी बुनियादी पसंद और नापसंद के लिए भी सरकार की ओर देखना पड़ रहा है।
राहुल गांधी ने सरकार पर प्रहार करते हुए कहा कि जब भी कोई संकट आता है, तो प्रधानमंत्री अपनी जिम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि उनकी अपनी जवाबदेही न बने। उन्होंने मोदी पर तीखा तंज कसते हुए कहा कि देश चलाना अब उनके बस की बात नहीं रही। राहुल गांधी के अनुसार, जनता को यह बताना कि उसे क्या खरीदना चाहिए और कहां जाना चाहिए, लोकतंत्र और आर्थिक प्रबंधन के गिरते स्तर को दर्शाता है। फिलहाल, दोनों नेताओं के इन बयानों के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा गर्म है कि क्या जनता का व्यक्तिगत त्याग देश के आर्थिक स्वास्थ्य को सुधारने का सही तरीका है। यह मुद्दा अब आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ सकता है।
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