जयपुर। राजस्थान के शिक्षा विभाग में इन दिनों अजीबोगरीब आदेशों और उन पर होने वाले विवादों का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। ताजा मामला बूंदी जिले का है, जहाँ एक धार्मिक आयोजन में व्यवस्थाएं संभालने के लिए सरकारी स्कूल के शिक्षकों की तैनाती कर दी गई। बूंदी जिले के बांसी स्थित अंबिका माता मंदिर में आयोजित हो रही रामकथा में पांच शिक्षकों की ड्यूटी लगाने का आदेश जैसे ही सार्वजनिक हुआ, वैसे ही शिक्षा जगत और राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया। शिक्षकों के कड़े विरोध और विपक्ष के तीखे हमलों के बाद अंततः प्रशासन को झुकना पड़ा और बुधवार को इस विवादित आदेश को आनन-फानन में वापस ले लिया गया। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शिक्षकों का उपयोग शैक्षिक कार्यों के बजाय अन्य गतिविधियों में किया जाना उचित है।
विस्तार से देखें तो बांसी के अंबिका माता मंदिर में 31 जनवरी से 7 फरवरी तक नौ दिवसीय महायज्ञ और रामकथा का एक बड़ा धार्मिक एवं सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस भव्य आयोजन में भीड़ को नियंत्रित करने और अन्य व्यवस्थाएं देखने के लिए शिक्षा विभाग ने एक लिखित आदेश जारी किया था। इस आदेश के तहत दो फरवरी से सात फरवरी तक क्षेत्र के एक ही सरकारी स्कूल के पांच शिक्षकों की ड्यूटी रामकथा स्थल पर लगा दी गई थी। जैसे ही ये शिक्षक स्कूल छोड़कर मंदिर परिसर में व्यवस्थाएं संभालने पहुँचे, स्कूल में पढ़ाई ठप हो गई। एक साथ पांच शिक्षकों के अनुपस्थित होने से स्कूल लगभग बंद होने की कगार पर पहुँच गया, जिससे छात्र और उनके अभिभावक आक्रोशित हो गए।
इस आदेश के पीछे शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के निर्देशों का हवाला दिया जा रहा है। बूंदी में समग्र शिक्षा विभाग के मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ने यह विवादास्पद आदेश जारी किया था, जिसमें स्पष्ट रूप से पांचों शिक्षकों को उनके मूल शैक्षिक कार्य से मुक्त कर रामकथा में भेजने की बात कही गई थी। शिक्षक संगठनों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि शिक्षकों का काम बच्चों को पढ़ाना है, न कि धार्मिक आयोजनों में टेंट या अन्य व्यवस्थाएं संभालना। संगठनों ने इसे शिक्षकों की गरिमा के खिलाफ और छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताया। अभिभावकों का भी तर्क था कि परीक्षा का समय नजदीक आ रहा है और ऐसे में शिक्षकों को स्कूल से हटाकर धार्मिक कार्यों में लगाना पूरी तरह गलत है।
मामले ने राजनीतिक रंग तब लिया जब कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने मंगलवार को यह मुद्दा राजस्थान विधानसभा में जोर-शोर से उठाया। गोविंद सिंह डोटासरा ने सरकार को घेरते हुए सवाल किया कि क्या अब स्कूलों में ताला लगाकर शिक्षकों से कथा और पंडाल की व्यवस्था कराई जाएगी? उन्होंने सरकार की कार्यप्रणाली पर तंज कसते हुए कहा कि शिक्षा विभाग का ध्यान शिक्षा के स्तर को सुधारने के बजाय ऐसे आयोजनों पर अधिक है। विधानसभा में विपक्ष के कड़े रुख और सोशल मीडिया पर बढ़ते जन-आक्रोश के कारण सरकार बैकफुट पर आ गई।
विवाद को बढ़ता देख जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने अपनी गलती स्वीकार की। बूंदी के जिला शिक्षा अधिकारी कुंजबिहारी भारद्वाज ने बुधवार को स्पष्ट किया कि शिक्षकों की ड्यूटी लगाने का फैसला गलत था। उन्होंने बताया कि इस पूरे मामले की समीक्षा की गई है और अब रामकथा में शिक्षकों की तैनाती के पुराने आदेश को निरस्त कर दिया गया है। कुंजबिहारी भारद्वाज ने एक संशोधित आदेश जारी करते हुए सभी पांचों शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से अपने मूल स्कूलों में लौटने और शिक्षण कार्य शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
दिलचस्प बात यह है कि राजस्थान के शिक्षा विभाग में इस तरह का यह पहला विवाद नहीं है। इसी साल जनवरी माह में भी एक ऐसा ही आदेश चर्चा में रहा था, जब शिक्षा विभाग ने शिक्षकों को उनके स्कूलों के आसपास घूमने वाले आवारा कुत्तों को भगाने की जिम्मेदारी सौंप दी थी। उस समय भी शिक्षक संगठनों ने मदन दिलावर के विभाग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। अब रामकथा में ड्यूटी लगाए जाने की घटना ने शिक्षकों के भीतर असुरक्षा और नाराजगी को और बढ़ा दिया है। शिक्षकों का कहना है कि उन्हें बार-बार गैर-शैक्षणिक कार्यों में झोंक दिया जाता है, जिससे उनकी मुख्य पहचान और कार्य प्रभावित होता है।
इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक तालमेल की कमी को भी उजागर किया है। एक ओर सरकार राज्य में शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ब्लॉक स्तर के अधिकारी ऐसे आदेश जारी कर देते हैं जो सीधे तौर पर स्कूलों के संचालन को बाधित करते हैं। अभिभावकों ने राहत की सांस ली है कि उनके बच्चे अब दोबारा पढ़ाई कर सकेंगे, लेकिन उन्होंने मांग की है कि भविष्य में इस तरह के तुगलकी आदेशों पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए। फिलहाल, बांसी में रामकथा का आयोजन जारी है, लेकिन अब वहां की व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी स्थानीय आयोजन समिति और प्रशासन के अन्य अंग संभालेंगे, न कि स्कूल के शिक्षक। शिक्षा विभाग के लिए यह घटना एक बड़ा सबक है कि जनभावनाओं और विद्यार्थियों के हितों को ताक पर रखकर लिए गए निर्णय अंततः सरकार की फजीहत का ही कारण बनते हैं।