नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लिए जाने के समय से ही 24 घंटे की समय-सीमा शुरू मानी जाएगी। आरोपी को न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की अवधि की गणना केवल औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से नहीं होगी। अदालत के अनुसार, व्यक्ति को जब वास्तव में हिरासत में लिया जाता है, उसी समय से यह अवधि शुरू हो जाती है।
अदालत ने कहा कि संविधान के तहत मिलने वाली इस सुरक्षा के लिहाज से हिरासत में लेना और औपचारिक गिरफ्तारी करना अलग-अलग नहीं माना जा सकता। दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होती है। ऐसे में हिरासत और गिरफ्तारी के बीच तकनीकी अंतर करके संवैधानिक सुरक्षा के दायरे को सीमित नहीं किया जा सकता।
हिरासत और गिरफ्तारी के बीच अंतर पर अदालत की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के बाद उसकी स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लग जाता है। इसलिए 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने की संवैधानिक व्यवस्था का उद्देश्य वास्तविक हिरासत के समय से ही लागू होना है।
इस व्याख्या का महत्व इसलिए है क्योंकि गिरफ्तारी की औपचारिक प्रक्रिया और किसी व्यक्ति को वास्तविक रूप से हिरासत में लेने के समय में अंतर हो सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आधिकारिक गिरफ्तारी का समय दर्ज कर देने से पहले से शुरू हो चुकी हिरासत की अवधि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जमानत के मामलों में मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत और मुकदमों में देरी से जुड़े मामलों पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी के मौलिक अधिकारों को विशेष कानूनों के प्रावधानों के साथ संतुलित करते हुए उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
अदालत ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए), नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट (एनडीपीएस) और धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) जैसे विशेष कानूनों के तहत जमानत से जुड़े अलग-अलग फैसलों का उल्लेख किया। इस संदर्भ में मौलिक अधिकारों की संवैधानिक महत्ता पर जोर दिया गया।
विशेष कानूनों की व्याख्या संविधान के अनुरूप हो
अदालत ने स्पष्ट किया कि विशेष कानूनों के प्रावधानों का इस्तेमाल संविधान की व्याख्या के आधार के रूप में नहीं किया जा सकता। इसके बजाय, इन कानूनों को संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप समझा और लागू किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों का संबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गिरफ्तारी की प्रक्रिया और जमानत के मामलों में संवैधानिक संरक्षण से है। अदालत ने यह रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित होने की स्थिति में कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ उसके मौलिक अधिकारों का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है।