नई दिल्ली, 29 सितम्बर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून 1980 के तहत की गई एहतियाती हिरासत को रद्द कर दिया है। अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को भी पलट दिया, जिसमें अफरोज के खिलाफ जारी हिरासत आदेश को बरकरार रखा गया था। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मंगलवार को मामले में फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि एहतियाती हिरासत का आदेश केवल न्यायालय के बाहर दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर नहीं ठहराया जा सकता। हिरासत का आदेश जारी करने वाले सक्षम अधिकारी को मामले से जुड़ी अन्य परिस्थितियों और उपलब्ध सामग्री पर भी स्वतंत्र रूप से विचार करना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मुल्ला अफरोज के मामले में हिरासत आदेश जारी करते समय संबंधित अधिकारियों ने आवश्यक पहलुओं पर समुचित विचार नहीं किया। अदालत ने इसे अधिकारों के अनुचित इस्तेमाल से जुड़ा मामला माना और इसी आधार पर हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। गैरकानूनी तरीके से एहतियाती हिरासत का आदेश जारी किए जाने के कारण राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का आर्थिक दंड भी लगाया गया।
क्या है संभल हिंसा का मामला
मुल्ला अफरोज पर वर्ष 2024 में संभल में हुई हिंसा से जुड़े मामले में आरोपी होने और हिंसा की साजिश में प्रमुख भूमिका निभाने का आरोप लगाया गया था। संभल की शाही जामा मस्जिद के अदालत के आदेश पर किए गए सर्वे के बाद क्षेत्र में हिंसा भड़क गई थी। इस घटना में चार लोगों की मौत हुई थी।
मुल्ला अफरोज को हिंसा की घटना के करीब 54 दिन बाद गिरफ्तार किया गया था। उसकी गिरफ्तारी पुलिस हिरासत के दौरान दिए गए कथित कबूलनामे से जुड़ी सामग्री के आधार पर की गई थी। बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उसे जमानत दे दी थी। इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत आदेश जारी किया गया। हाई कोर्ट ने बाद में इस आदेश को वैध माना था, जिसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पुलिस हिरासत में कथित तौर पर दिया गया कबूलनामा एहतियाती हिरासत का पर्याप्त कानूनी आधार नहीं हो सकता। याचिका में यह भी कहा गया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की संख्या मात्र से उसकी एहतियाती हिरासत को उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध सामग्री का समुचित मूल्यांकन जरूरी है।
याचिकाकर्ता की ओर से संभल हिंसा के दौरान पुलिस की गोलीबारी से जुड़े पहलू को भी अदालत के समक्ष उठाया गया। इस मामले में निष्पक्ष जांच की आवश्यकता जताते हुए विरोध याचिका दाखिल करने की अनुमति मांगी गई।
वहीं उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से हिरासत आदेश का बचाव करते हुए कहा गया कि अफरोज की गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी और भविष्य में उसके दोबारा ऐसी गतिविधियों में शामिल होने की संभावना को ध्यान में रखते हुए एहतियाती कार्रवाई की गई थी।
शीर्ष अदालत के फैसले के बाद मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत समाप्त हो गई है। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एहतियाती हिरासत के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया और संबंधित प्राधिकारियों द्वारा सभी परिस्थितियों पर विचार किए जाने के महत्व को भी रेखांकित किया।
Pls read:SC: सुप्रीम कोर्ट में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई