SC: सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी के पांच नुकसान गिनाए जहरीली शराब की घटनाओं का भी किया जिक्र – The Hill News

SC: सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी के पांच नुकसान गिनाए जहरीली शराब की घटनाओं का भी किया जिक्र

नई दिल्ली। शराबबंदी की प्रभावशीलता पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इससे जुड़ी कई व्यावहारिक चुनौतियों पर टिप्पणी की। अदालत ने शराब पर पूर्ण प्रतिबंध के संदर्भ में राजस्व नुकसान, कानून लागू करने में होने वाला खर्च, पुलिस तंत्र में भ्रष्टाचार, अवैध शराब के कारोबार और अन्य नशीले पदार्थों के बढ़ते खतरे जैसे पांच पहलुओं का उल्लेख किया। पीठ ने पिछले कुछ वर्षों में गुजरात समेत विभिन्न राज्यों में जहरीली शराब से हुई घटनाओं का भी संदर्भ दिया।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स के नियम 18A और 18B को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन नियमों के तहत मेथनॉल की बिक्री और खरीद से संबंधित कुछ प्रतिबंध लागू किए गए थे। इंडियन केमिकल काउंसिल और कुछ रसायन निर्माता कंपनियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने शराबबंदी की नीतियों के प्रभाव और उससे जुड़े नियामकीय उपायों पर चर्चा की।

शराबबंदी से जुड़े पांच पहलुओं का उल्लेख

सुप्रीम कोर्ट ने शराब पर पूर्ण प्रतिबंध के संदर्भ में पांच प्रमुख समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया। इनमें शराब की बिक्री से मिलने वाले आबकारी राजस्व का समाप्त होना, प्रतिबंध को लागू करने और उसकी निगरानी पर सरकारी संसाधनों का खर्च, पुलिस और प्रशासन में भ्रष्टाचार की संभावनाएं, अवैध तथा नकली शराब का कारोबार और लोगों के दूसरे नशीले पदार्थों की ओर जाने का खतरा शामिल है।

अदालत के अनुसार शराब की वैध बिक्री पर रोक से सरकार को आबकारी शुल्क के रूप में मिलने वाला राजस्व प्रभावित होता है। वहीं, प्रतिबंध को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए निगरानी, जांच और तस्करी रोकने पर अतिरिक्त सरकारी संसाधनों की जरूरत पड़ती है।

पीठ ने यह भी कहा कि प्रतिबंध के बावजूद मांग बनी रहने पर अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलने की आशंका रहती है। इससे गैरकानूनी और मिलावटी शराब का बाजार विकसित हो सकता है। अदालत ने शराब के स्थान पर अन्य नशीले पदार्थों के इस्तेमाल से जुड़े संभावित खतरे का भी उल्लेख किया।

जहरीली शराब की घटनाओं का जिक्र

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात और मध्य प्रदेश में जहरीली शराब से जुड़ी हाल की घटनाओं का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार भावनगर में हुई घटना में 13 और सागर में 15 लोगों की मौत हुई थी। पीठ ने ऐसी घटनाओं को अधिकारियों के लिए कार्रवाई की आवश्यकता का संकेत बताया।

अदालत ने गुजरात में लंबे समय से लागू सख्त शराबबंदी नीति का भी संदर्भ दिया। उसके अनुसार राज्य में स्वतंत्रता के बाद और राज्य गठन के बाद से कई बड़ी जहरीली शराब त्रासदियां सामने आई हैं, जिनमें 600 से अधिक लोगों की जान जाने का उल्लेख किया गया।

महाराष्ट्र सरकार की दलीलें नहीं मानीं

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और नियम 18A तथा 18B को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि इन प्रावधानों और जहरीली शराब की घटनाओं को रोकने के उद्देश्य के बीच पर्याप्त तर्कसंगत संबंध स्पष्ट नहीं किया गया।

पीठ ने कहा कि राज्य सरकार की मंशा पर संदेह नहीं किया जा रहा है, लेकिन केवल उद्देश्य अच्छा होने के आधार पर किसी नियम को मनमानेपन की कसौटी से बाहर नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि गैर-दवा निर्माताओं को मेथनॉल बेचने से पहले उसमें कड़वा करने वाला पदार्थ और रंग मिलाने की अनिवार्यता से मेथनॉल के उपयोग को कैसे हतोत्साहित किया जाएगा। पीठ ने इस बात पर भी सवाल किया कि ऐसे पदार्थ मिलाने से मेथनॉल की रासायनिक संरचना या जहरीली शराब बनाने की क्षमता पर क्या प्रभाव पड़ता है। राज्य की ओर से अन्य मिलावटी पदार्थों के इस्तेमाल से बनने वाली नकली शराब को रोकने की व्यवस्था को लेकर भी पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सका।

 

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