चंडीगढ़। भारतीय जनता पार्टी ने पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले सांगठनिक स्तर पर एक बड़ा बदलाव करते हुए सतीश पूनिया को राज्य का नया प्रभारी नियुक्त किया है। पूनिया की नियुक्ति इस मायने में महत्वपूर्ण है कि पार्टी ने केवल जातीय या क्षेत्रीय समीकरणों को नहीं देखा, बल्कि एक ऐसे नेता पर दांव लगाया है जो संगठन को जमीनी स्तर पर खड़ा करने और चुनाव को सीधे बूथ तक ले जाने की क्षमता रखता है। राजस्थान के प्रमुख जाट नेता के रूप में पहचाने जाने वाले सतीश पूनिया ने हरियाणा में भाजपा की लगातार तीसरी बार जीत सुनिश्चित करने में जो रणनीतिक कौशल दिखाया, वही अब पंजाब में उनकी नई जिम्मेदारी का आधार बना है।
सतीश पूनिया का चुनावी प्रबंधन उनके ‘बूथ जीता तो चुनाव जीता’ के मूल मंत्र पर टिका है। हरियाणा प्रभारी के रूप में उन्होंने पन्ना प्रमुख और बूथ स्तर की ऐसी पुख्ता व्यवस्था तैयार की थी, जिसका मुकाबला करने में विपक्ष विफल रहा। उन्होंने पन्ना प्रमुखों के जरिए मतदाताओं से सीधा संवाद स्थापित किया और ‘विस्तारकों’ की एक ऐसी टीम खड़ी की, जिनका एकमात्र लक्ष्य चुनावी राजनीति के बजाय संगठन को बुनियादी स्तर पर मजबूत करना था। पंजाब में भी वे इसी हरियाणा मॉडल को धरातल पर उतारने की तैयारी में हैं।
पंजाब में सतीश पूनिया के सामने पांच प्रमुख चुनौतियां
पूनिया के लिए पंजाब की राह आसान नहीं होगी, उन्हें कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा:
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संगठन का विस्तार: राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर बूथ और मंडल स्तर तक पार्टी को सक्रिय और मजबूत करना।
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गुटबाजी पर लगाम: पुराने दिग्गज नेताओं, नए चेहरों और अलग-अलग खेमों के बीच सामंजस्य बिठाकर अनुशासन कायम करना।
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किसान और ग्रामीण क्षेत्र: भाजपा की शहरी पहचान से आगे बढ़कर गांवों और सिख मतदाताओं के बीच पार्टी की स्वीकार्यता को बढ़ाना।
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तीसरा विकल्प बनना: सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को एक सशक्त विकल्प के रूप में पेश करना।
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अकेले चुनाव की तैयारी: बिना किसी गठबंधन के सभी सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारना और उनके लिए प्रभावी चुनावी ढांचा तैयार करना।
पूनिया का राजनीतिक सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अपनी राजनीति की शुरुआत की और संगठन के विभिन्न पदों पर रहते हुए राजस्थान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। साल 2018 में पहली बार विधायक बनने के बाद से उनका कद लगातार बढ़ता गया। संगठन के प्रति उनकी निष्ठा और चुनावी प्रबंधन में उनकी विशेषज्ञता को देखते हुए ही पार्टी ने उन्हें पहले हरियाणा और अब पंजाब जैसे चुनौतीपूर्ण राज्य की कमान सौंपी है।
खास बात यह है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के साथ उनके गहरे और बेहतर तालमेल का लाभ पंजाब में भी मिल सकता है, क्योंकि सैनी पिछले काफी समय से पंजाब की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। महज आठ वर्षों के भीतर ही सतीश पूनिया ने अपनी रणनीतिक कुशलता के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है, जिसे देखते हुए उन्हें साल 2026 में राज्यसभा के लिए भी चुना गया। अब पंजाब भाजपा के भविष्य को संवारने और वहां पार्टी का आधार मजबूत करने की बड़ी जिम्मेदारी उनके कंधों पर है।