नई दिल्ली। भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा है कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है और इसे भारतीय नागरिकता का अंतिम या पुख्ता कानूनी प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। पासपोर्ट सेवा दिवस के 14वें अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह स्पष्ट किया कि पासपोर्ट अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी भारतीय की राष्ट्रीयता को प्रमाणित जरूर करता है, लेकिन इसे नागरिकता के प्राथमिक दस्तावेज के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मंत्रालय के अनुसार, पासपोर्ट धारक होने मात्र से किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकों के लिए संचालित होने वाली सभी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ स्वतः नहीं मिल जाता। इस बयान के बाद देश में एक नई बहस छिड़ गई है कि यदि व्यापक पुलिस सत्यापन और पृष्ठभूमि जांच के बाद जारी होने वाला पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो फिर कौन सा दस्तावेज नागरिकता का असली आधार है।
विपक्ष और प्रमुख हस्तियों ने उठाए सवाल
सरकार के इस रुख की सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में कड़ी आलोचना हो रही है। गीतकार जावेद अख्तर ने इस रुख को बेतुका करार देते हुए सवाल किया कि क्या सरकार को खुद अपनी सत्यापन प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है? उन्होंने पूछा कि क्या सरकार इस बात से आश्वस्त नहीं है कि जिसे वह पासपोर्ट जारी कर रही है, वह वास्तव में भारतीय नागरिक है या नहीं। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) नेता आदित्य ठाकरे ने चिंता जताई कि यदि सरकार का यह मानना है कि गैर-भारतीयों को भी पासपोर्ट जारी हो सकते हैं, तो इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय पासपोर्ट की साख और इस पर विदेशी देशों का भरोसा कम हो सकता है। कांग्रेस के पूर्व नेता कपिल सिबल ने भी सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि आखिर नागरिकता का असली प्रमाण पत्र कौन सा है।
कानूनी आधार और अदालती फैसला
सरकारी सूत्रों और कानूनी जानकारों ने इस विवाद पर स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट और नागरिकता दो अलग-अलग कानूनों द्वारा शासित होते हैं। उनके अनुसार, पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया ‘पासपोर्ट अधिनियम 1967’ के तहत आती है, जबकि नागरिकता का निर्धारण ‘नागरिकता अधिनियम 1955’ के जरिए होता है।
विशेषज्ञों ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के 2013 के एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें यह माना गया था कि 1967 का कानून तकनीकी रूप से गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी करने की अनुमति देता है। इसलिए, केवल पासपोर्ट का होना नागरिकता का ‘निर्णायक’ प्रमाण नहीं हो सकता। पूर्व राजनयिक निरुपमा मेनन राव ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट और नागरिकता में बुनियादी अंतर यह है कि पासपोर्ट सरकार की संपत्ति है जिसे कभी भी जब्त किया जा सकता है, जबकि नागरिकता एक कानूनी स्थिति है जिसे स्वेच्छा से छोड़े बिना आसानी से नहीं छीना जा सकता।
नागरिकता के प्रमाण और प्राप्ति के तरीके
नागरिकता अधिनियम, 1955 और सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार भारतीय नागरिकता के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारियां निम्नलिखित हैं:
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असली प्रमाण: जन्म प्रमाण पत्र को भारतीय नागरिकता का सबसे पुख्ता दस्तावेज माना जाता है।
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नागरिकता प्रमाण पत्र: यह प्रमाण पत्र आमतौर पर उन लोगों को जारी किया जाता है जो पंजीकरण या प्राकृतिककरण के माध्यम से भारतीय नागरिकता प्राप्त करते हैं। जन्म या वंश के आधार पर नागरिक अधिकांश भारतीयों के पास ऐसा अलग प्रमाण पत्र नहीं होता।
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नागरिकता प्राप्त करने के 5 तरीके:
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जन्मजात नागरिकता (Birth)
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वंश के आधार पर (Descent)
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पंजीकरण द्वारा (Registration)
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प्राकृतिककरण द्वारा (Naturalisation)
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किसी क्षेत्र के भारत में विलय द्वारा (Incorporation of territory)
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सत्यापन और पहचान का संकट
सोशल मीडिया पर कई उपयोगकर्ताओं ने इस बात पर रोष जताया है कि वर्तमान व्यवस्था में आधार, पैन और पासपोर्ट के लिए एक-दूसरे पर निर्भरता का एक चक्र बना हुआ है। पासपोर्ट के लिए पुलिस सत्यापन और आधार कार्ड जैसे दस्तावेजों की आवश्यकता होती है, इसके बावजूद इसे नागरिकता का प्रमाण न मानना आम जनता के लिए भ्रम पैदा करने वाला है। हालांकि, विदेश मंत्रालय का तर्क है कि पासपोर्ट का प्राथमिक उद्देश्य केवल विदेश यात्रा के दौरान धारक की पहचान सुनिश्चित करना और उसके अधिकारों की रक्षा करना है। नागरिकता साबित करने के लिए अभी भी 1955 के अधिनियम के प्रावधान ही सर्वोपरि माने जाएंगे।
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