लैंसडौन। लैंसडौन के ऐतिहासिक नायक भवानी दत्त जोशी अशोक चक्र परेड ग्राउंड में शनिवार का दिन गौरव, शौर्य और भावनाओं का एक अनूठा संगम रहा। सेना के रेजिमेंटल बैंड की मधुर धुनों और ‘बढ़े-चलों, गढ़वालियों, बढ़े-चलों’ जैसे ओजस्वी गीतों के बीच 258 अग्निवीरों ने अपनी कठिन ट्रेनिंग पूरी कर देश सेवा की शपथ ली। इस भव्य समारोह का सबसे खास और भावुक पल वह था, जब कोर्स 08 के बैच-01 में ‘सर्वश्रेष्ठ अग्निवीर’ के खिताब के लिए आयुष सिंह गुसाईं का नाम पुकारा गया। नाम की घोषणा होते ही पूरा परेड ग्राउंड तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा और आयुष की आंखें खुशी व गर्व से नम हो गईं।
पौड़ी जनपद के कंडोली गांव निवासी आयुष सिंह गुसाईं के लिए यह पल केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि सेना के साथ उनके परिवार की दूसरी पीढ़ी के जुड़ाव की एक नई और सुनहरी शुरुआत थी। आयुष के पिता दिनेश सिंह भी गढ़वाल राइफल्स की तीसरी बटालियन में सूबेदार के पद पर अपनी सेवाएं देने के बाद सेवानिवृत्त हुए हैं। आयुष ने अपने बचपन से ही घर में पिता की वर्दी और उनके अनुशासन को देखा था, जिसने उन्हें सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया। यह उनकी अटूट मेहनत का ही परिणाम था कि वे अपनी ट्रेनिंग के दौरान हर परीक्षा और टेस्ट में अव्वल रहे।
आयुष के लिए सर्वश्रेष्ठ बनने का यह सफर काफी चुनौतीपूर्ण रहा। पिछले 24 हफ्तों की कड़ी तपस्या में उन्होंने अपने शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य की हर सीमा को परखा। पहाड़ों की ऊबड़-खाबड़ जमीन, तपती धूप, बारिश का कीचड़ और रातों की थका देने वाली गश्त के बीच भी उनका हौसला कभी डगमगाया नहीं। आयुष बताते हैं कि हर कठिन मोड़ पर ‘जय बद्री विशाल’ का उद्घोष उन्हें नई ऊर्जा प्रदान करता था। परेड के बाद जब आयुष ने पूर्ण सैन्य वर्दी में मंच पर जाकर सलामी ली, तो दर्शक दीर्घा में मौजूद उनकी माता अनीता देवी और पिता दिनेश सिंह की आंखें भी भर आईं। उनके पिता ने गर्व से सीना तानकर कहा कि आज आयुष केवल उनका बेटा नहीं, बल्कि गढ़वाल रेजिमेंट का एक अनुशासित सिपाही है।
ट्रेनिंग सेंटर के उस्तादों और प्रशिक्षकों के अनुसार, आयुष ने अनुशासन, ड्रिल, फिजिकल और क्लासरूम गतिविधियों में अपनी श्रेष्ठता साबित की। आयुष की इसी बहुमुखी प्रतिभा ने उन्हें बैच का टॉप परफॉर्मर बनाया। इसी समारोह में रजत पदक हासिल करने वाले अग्निवीर मनवर सिंह के लिए भी शनिवार का दिन अविस्मरणीय बन गया। मनवर के परिजनों ने इस सफलता का पूरा श्रेय गढ़वाल राइफल्स द्वारा दी जाने वाली उच्च स्तरीय और विश्वस्तरीय ट्रेनिंग को दिया।
इस गौरवशाली बैच में विभिन्न श्रेणियों में पदक जीतने वाले अन्य जांबाज अग्निवीरों में आर्यन बिष्ट ने तीसरा स्थान प्राप्त किया। शारीरिक दक्षता (फिजिकल) में किरण सिंह नेगी को सर्वश्रेष्ठ चुना गया, जबकि वीरेंद्र सिंह थापा ने अपनी अचूक फायरिंग क्षमता के लिए पदक जीता। ड्रिल के क्षेत्र में हिमांशु ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
समारोह के अंत में गढ़वाल राइफल्स लैंसडौन के कमांडेंट ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी ने सभी पास आउट हुए अग्निवीरों का मनोबल बढ़ाया। उन्होंने कहा कि गढ़वाल राइफल्स अपनी बेहतरीन ट्रेनिंग और 135 वर्षों की गौरवशाली सैन्य परंपरा व अदम्य साहस के लिए भारतीय थल सेना में एक विशेष स्थान रखती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ये सभी अग्निवीर भविष्य में देश की सुरक्षा के लिए मिलने वाली हर चुनौती का डटकर मुकाबला करेंगे और रेजिमेंट के सम्मान को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। ब्रिगेडियर नेगी के अनुसार, इन युवाओं का समर्पण यह सुनिश्चित करता है कि भारत की सीमाएं सुरक्षित हाथों में हैं।
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