Himachal: प्रदेश में सरकारी भूमि पर कब्जे होंगे नियमित सुक्खू सरकार ने नई नीति को दी मंजूरी

शिमला। हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार ने राज्य के उन हजारों परिवारों को बड़ी राहत देने का निर्णय लिया है जो दशकों से सरकारी भूमि पर काबिज हैं। रविवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में ‘अतिक्रमण नियमितीकरण नीति-2026’ को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी गई है। इस नीति का मुख्य उद्देश्य उन छोटे और सीमांत किसानों के साथ-साथ भूमिहीन परिवारों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है, जिनके पास आजीविका के लिए बहुत कम जमीन है और वे सरकारी जमीन पर खेती कर अपना गुजारा कर रहे हैं। हालांकि, यह नीति पूरी तरह तभी प्रभावी होगी जब इसे केंद्र सरकार से अंतिम स्वीकृति मिल जाएगी।

सरकार द्वारा तैयार की गई इस नई व्यवस्था के तहत राहत पाना आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए कुछ कड़े नियम और शर्तें तय की गई हैं। सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि कब्जाधारी को अपने दावे की पुष्टि के लिए कम से कम एक विश्वसनीय गवाह प्रस्तुत करना होगा। इसके अलावा, संबंधित ग्राम सभा से इस कब्जे का अनुमोदन प्राप्त करना भी अनिवार्य होगा। सरकार का मानना है कि ग्राम सभा की भागीदारी से स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता बनी रहेगी और केवल वास्तविक पात्रों को ही इसका लाभ मिल सकेगा। ग्राम सभा के अनुमोदन के बिना किसी भी कब्जे को नियमित नहीं किया जाएगा।

आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में वर्तमान में लगभग 1.67 लाख किसान ऐसे हैं जिन्होंने अलग-अलग समय पर और विभिन्न कारणों से सरकारी जमीन पर कब्जा किया हुआ है। नई नीति के तहत सरकार ने 20 बीघा की एक अधिकतम सीमा निर्धारित की है। इस प्राविधान के अनुसार, नियमितीकरण का लाभ केवल उन्हीं किसानों को मिलेगा जिनके पास अपनी निजी भूमि और कब्जा की गई भूमि को मिलाकर कुल क्षेत्रफल 20 बीघा से कम बैठता हो। जिन लोगों के पास पहले से ही 20 बीघा या उससे अधिक भूमि उपलब्ध है, उन्हें इस नई नीति के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है।

इस नीति को लागू करने के पीछे सरकार का तर्क है कि प्रदेश के बहुत से गरीब और भूमिहीन परिवार वर्षों से सरकारी भूमि पर खेती-बाड़ी कर अपनी आजीविका चला रहे हैं, लेकिन उनके पास उस जमीन का कोई कानूनी मालिकाना हक नहीं है। इस कारण वे न तो सरकारी योजनाओं का सही से लाभ ले पाते हैं और न ही उन्हें बैंक ऋण जैसी सुविधाएं मिल पाती हैं। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अब ऐसे कब्जाधारियों को ठोस साक्ष्य के साथ यह साबित करना होगा कि वे एक लंबी अवधि से उस विशेष भूमि का निरंतर उपयोग कर रहे हैं।

राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने इस नीति के संदर्भ में स्पष्ट किया है कि सरकार का मुख्य ध्येय छोटे किसानों और जरूरतमंदों की मदद करना है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि लाभ केवल उन्हीं को दिया जाएगा जिनके पास सीमित संसाधन हैं और जो नीति के तय मानदंडों को पूरा करते हैं। नेगी ने चेतावनी दी है कि फर्जी दावों और गलत तरीके से सरकारी जमीन हड़पने की कोशिशों को रोकने के लिए एक अत्यंत सख्त सत्यापन प्रक्रिया अपनाई जाएगी। प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि इस नीति का कोई दुरुपयोग न कर सके।

हिमाचल प्रदेश कैबिनेट का यह फैसला राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे उन परिवारों को एक नई पहचान और सुरक्षा मिलेगी जो वर्षों से बेदखली के डर में जी रहे थे। अब राज्य सरकार इस प्रस्ताव को केंद्र को भेजेगी, जहां से मंजूरी मिलने के बाद इसे पूरे प्रदेश में लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। इस कदम से राज्य के लाखों लोगों को अपनी जमीन पर मालिकाना हक मिलने की उम्मीद जगी है।

 

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