US: टेक सेक्टर की छंटनी से भारतीय इंजीनियरों पर संकट एच-1बी वीजा बना मुसीबत – The Hill News

US: टेक सेक्टर की छंटनी से भारतीय इंजीनियरों पर संकट एच-1बी वीजा बना मुसीबत

नई दिल्ली। अमेरिका के तकनीकी क्षेत्र (टेक सेक्टर) में आई छंटनी की एक और भीषण लहर ने वहां कार्यरत हजारों भारतीय इंजीनियरों और सॉफ्टवेयर डेवलपर्स की रातों की नींद उड़ा दी है। मेटा, अमेजन और लिंक्डइन जैसी दिग्गज कंपनियों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और ऑटोमेशन के बढ़ते प्रभाव के कारण बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म की जा रही हैं। भारतीय पेशेवरों के लिए यह केवल नौकरी जाने का मामला नहीं है, बल्कि उनके ‘अमेरिकन ड्रीम’ और अमेरिका में रहने के कानूनी अधिकार पर भी सीधा प्रहार है।

अमेरिका में काम करने वाले अधिकांश भारतीय टेक पेशेवर एच-1बी (H-1B) वीजा पर निर्भर हैं। इस वीजा की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह सीधे तौर पर व्यक्ति की कंपनी से जुड़ा होता है। जैसे ही कंपनी किसी कर्मचारी को नौकरी से निकालती है, उसका वीजा स्टेटस खतरे में पड़ जाता है। अमेरिकी इमिग्रेशन नियमों के अनुसार, नौकरी जाने के बाद ऐसे कर्मचारियों को केवल 60 दिनों का ‘ग्रेस पीरियड’ मिलता है। यह समय सीमा कर्मचारी के अंतिम कार्य दिवस से शुरू होती है। इस बेहद कम समय में उन्हें या तो कोई नई कंपनी ढूंढनी होती है जो उनका वीजा स्पॉन्सर कर सके, या फिर उन्हें कानूनी रूप से अमेरिका छोड़ना पड़ता है।

60 दिनों का यह नियम भारतीय परिवारों के लिए किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है। सालों से अमेरिका में बसे, घर खरीद चुके और अपने बच्चों को वहां के स्कूलों में पढ़ा रहे पेशेवरों के लिए दो महीने के भीतर सब कुछ समेटकर भारत लौटना एक डरावना सपना है। मंदी के इस दौर में नई नौकरी मिलना वैसे ही चुनौतीपूर्ण है, ऊपर से वीजा ट्रांसफर की जटिल प्रक्रिया इसे और मुश्किल बना देती है। कई लोग समय बचाने के लिए अस्थायी रूप से बी-2 टूरिस्ट वीजा का विकल्प चुनते हैं, लेकिन अब अमेरिकी अधिकारी ऐसे आवेदनों की भी बहुत सूक्ष्मता से जांच कर रहे हैं।

आंकड़ों की बात करें तो ‘Layoffs.fyi’ के अनुसार, इस वर्ष अब तक टेक इंडस्ट्री में 1,10,000 से अधिक लोग अपनी नौकरियां गंवा चुके हैं। इनमें एक बहुत बड़ा हिस्सा भारतीयों का है, क्योंकि एच-1बी वीजा पाने वालों में सबसे अधिक संख्या भारतीयों की ही होती है। यद्यपि मेटा जैसी कंपनियां छंटनी के बदले 16 सप्ताह का मूल वेतन और हेल्थकेयर कवरेज जैसी वित्तीय सहायता दे रही हैं, लेकिन यह मदद वीजा की कानूनी अनिश्चितता और उससे उत्पन्न होने वाले भावनात्मक तनाव को कम करने में नाकाफी साबित हो रही है।

तकनीक के क्षेत्र में आ रहा यह बदलाव स्थायी नजर आ रहा है। कंपनियां अब पारंपरिक कोडिंग और सॉफ्टवेयर सपोर्ट के बजाय अपने संसाधनों को पूरी तरह एआई और ऑटोमेशन की तरफ मोड़ रही हैं। अकेले मेटा कंपनी इस वर्ष एआई निवेश पर 100 बिलियन डॉलर से अधिक खर्च करने की तैयारी में है। इसका सीधा अर्थ है कि भविष्य में रूटीन सॉफ्टवेयर भूमिकाओं के लिए अवसर और भी कम होंगे। इस अनिश्चितता ने कई भारतीयों को अब भारत लौटने या कनाडा और यूरोप जैसे देशों का विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है, जहां वीजा नियम अमेरिका के मुकाबले थोड़े उदार हैं। दशकों से भारतीयों का पसंदीदा गंतव्य रहा अमेरिका अब अपनी सख्त इमिग्रेशन नीतियों और बार-बार होने वाली छंटनी के कारण अपनी चमक खोता दिख रहा है।

 

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