Maharashtra: अजित पवार के निधन से महायुति गठबंधन के सामने खड़ी हुई नई चुनौतियां – The Hill News

Maharashtra: अजित पवार के निधन से महायुति गठबंधन के सामने खड़ी हुई नई चुनौतियां

नई दिल्ली। महाराष्ट्र की राजनीति में बुधवार की सुबह एक ऐसी खबर आई जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। उपमुख्यमंत्री अजित पवार को ले जा रहा विमान बारामती के समीप दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें अजित पवार सहित विमान में सवार सभी यात्रियों की मृत्यु हो गई। यह घटना केवल एक व्यक्तिगत क्षति नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र के सत्ताधारी महायुति गठबंधन के लिए एक ऐसा भीषण राजनीतिक झटका है, जिससे उबरना वर्तमान परिस्थितियों में अत्यंत चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है। अजित पवार के जाने से राज्य की राजनीति में एक बड़ा खालीपन पैदा हो गया है।

महाराष्ट्र में महायुति सरकार का गठन साल 2022 में हुआ था, जब एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में बड़ी बगावत कर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था। इसके एक वर्ष पश्चात अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार के विरुद्ध मोर्चा खोलते हुए एनसीपी को विभाजित कर दिया और महायुति गठबंधन में शामिल होकर सरकार को और अधिक मजबूती प्रदान की थी। तब से वे सरकार के एक महत्वपूर्ण स्तंभ बने हुए थे।

साल 2024 के विधानसभा चुनावों के बाद राज्य के राजनीतिक समीकरण काफी बदल गए थे। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने 288 में से 132 सीटें जीतकर खुद को सबसे बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित किया। वहीं, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को 57 और अजित पवार की एनसीपी को 41 सीटें प्राप्त हुईं। विपक्षी खेमे में उद्धव ठाकरे की शिवसेना मात्र 20 सीटों पर सिमट गई थी। इस बड़ी जीत के बाद एकनाथ शिंदे दोबारा मुख्यमंत्री पद की मांग कर रहे थे, लेकिन बीजेपी ने उनके इस दावे को स्वीकार नहीं किया। अंततः शिंदे को उपमुख्यमंत्री पद से ही संतोष करना पड़ा। बीजेपी के लिए शिंदे और अजित पवार एक-दूसरे को संतुलित करने का माध्यम थे, ताकि सत्ता का केंद्र एक जगह सीमित न रहे।

स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान महायुति के भीतर का आंतरिक संघर्ष और अधिक गहराने लगा था। कई नगर निगमों में गठबंधन के सहयोगी दल ही एक-दूसरे के विरुद्ध ताल ठोकते नजर आए। विशेष रूप से मुंबई, पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ के चुनावों में बीजेपी और शिंदे गुट ने आपसी तालमेल कर लिया, लेकिन अजित पवार की एनसीपी को इस समीकरण से बाहर रखा गया। इस उपेक्षा ने अजित पवार को नाराज कर दिया, जिसके परिणामस्वरुप उनकी नजदीकियां दोबारा शरद पवार गुट के साथ बढ़ने लगी थीं। पुणे और पिंपरी-चिंचवड़, जो पारंपरिक रूप से एनसीपी के गढ़ रहे हैं, वहां दोनों पवार गुटों ने मिलकर चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई थी।

इस राजनीतिक खींचतान के बीच अजित पवार ने बीजेपी नेतृत्व पर भी तीखे हमले किए थे। उन्होंने खुद पर लगे पुराने सिंचाई घोटाले के आरोपों का जिक्र करते हुए न्याय प्रणाली और जांचों पर सवाल खड़े किए थे। साथ ही उन्होंने पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम में बीजेपी के शासन काल के दौरान हुए भ्रष्टाचार और बढ़ते कर्ज को लेकर कड़ी टिप्पणी की थी। उन्होंने बीजेपी शासित निगम को ‘लुटेरों का गिरोह’ तक कह दिया था, जिस पर देवेंद्र फडणवीस ने पलटवार करते हुए उन्हें आत्ममंथन करने को कहा था।

नगर निगम चुनावों के नतीजों ने भी तनातनी को बढ़ाया, जहाँ बीजेपी पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसी अस्थिर वातावरण के बीच अजित पवार की मौत ने महायुति के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि अजित पवार के साथ आए विधायक कहीं वापस शरद पवार की एनसीपी में न चले जाएं। यदि ऐसा होता है, तो विधानसभा में विपक्ष बेहद ताकतवर हो जाएगा और सरकार के लिए बहुमत का संकट खड़ा हो सकता है।

अजित पवार के निधन के बाद उनकी एनसीपी के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यद्यपि उनके गुट ने हालिया चुनावों में शरद पवार की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया था, लेकिन अब नेतृत्व की लड़ाई तेज हो सकती है। यदि दोनों एनसीपी गुटों के विलय की संभावना बनती है, तो शरद पवार अपनी पुत्री सुप्रिया सुले को नेतृत्व सौंपना चाहेंगे, जो अजित गुट के वरिष्ठ नेताओं जैसे सुनील तटकरे, प्रफुल्ल पटेल और सुनेत्रा पवार को स्वीकार्य नहीं हो सकता। फिलहाल, महाराष्ट्र की राजनीति एक अनिश्चित मोड़ पर खड़ी है।

 

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