यरुशलम। इजरायल में चुनावी व्यवस्था भारत से काफी अलग है। यहां मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्र से किसी एक उम्मीदवार को चुनने के बजाय राजनीतिक दलों की सूची के पक्ष में मतदान करते हैं। संसद में सीटों का बंटवारा पार्टियों को मिले कुल राष्ट्रीय मत प्रतिशत के आधार पर किया जाता है। इसी व्यवस्था के कारण सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दलों को अक्सर गठबंधन का सहारा लेना पड़ता है। चुनावी राजनीति में किसी दल को बहुमत हासिल करने के लिए संसद में 120 में से कम से कम 61 सीटों का समर्थन जरूरी होता है।
इजरायल में चुनाव का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि सरकार का नेतृत्व किसके हाथ में जाएगा, यह केवल किसी एक पार्टी के प्रदर्शन पर निर्भर नहीं करता, बल्कि विभिन्न दलों के बीच बनने वाले गठबंधन पर भी निर्भर करता है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच मुकाबले के संदर्भ में देश की चुनाव प्रणाली को समझना महत्वपूर्ण है।
120 सदस्यों वाली संसद और एक राष्ट्रीय निर्वाचन क्षेत्र
इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। देश में चुनाव के दौरान पूरे इजरायल को एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है। इसका अर्थ है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले मतदाता अपनी पसंद की राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं और मतदान के बाद राष्ट्रीय स्तर पर मिले मतों के अनुपात में सीटें आवंटित की जाती हैं।
इस व्यवस्था में किसी पार्टी को पूरे देश में मिले वोट उसके संसदीय प्रतिनिधित्व का आधार बनते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी दल को कुल वैध मतों का लगभग 10 प्रतिशत हासिल होता है, तो सामान्य अनुपात के अनुसार उसे करीब 12 सीटें मिल सकती हैं। वास्तविक सीटों का आवंटन निर्धारित चुनावी नियमों के अनुसार होता है।
संसद में पहुंचने के लिए 3.25 प्रतिशत वोट जरूरी
इजरायल की चुनाव प्रणाली में किसी राजनीतिक दल को संसद में प्रतिनिधित्व पाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध मत हासिल करने होते हैं। इसे चुनावी सीमा या इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड कहा जाता है।
जो दल इस निर्धारित सीमा तक नहीं पहुंच पाते, उन्हें नेसेट में सीटें नहीं मिलतीं। इसके बाद पात्र दलों के बीच सीटों का बंटवारा लागू आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत किया जाता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य संसद में प्रतिनिधित्व के लिए न्यूनतम समर्थन सुनिश्चित करना है, हालांकि इससे छोटे दलों के लिए संसद में प्रवेश करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
सरकार बनाने में गठबंधन की अहम भूमिका
इजरायल में किसी पार्टी को सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय संसद में कम से कम 61 सदस्यों का समर्थन जुटाना पड़ता है। यदि किसी दल को अकेले इतनी सीटें नहीं मिलतीं, तो उसे दूसरी पार्टियों के साथ समझौता करना पड़ता है।
गठबंधन की बातचीत में विभिन्न दलों की नीतियां, राजनीतिक प्राथमिकताएं और सरकार में उनकी संभावित भूमिका महत्वपूर्ण होती हैं। कई बार छोटे दलों का समर्थन भी सरकार के गठन में निर्णायक साबित हो सकता है। इसी वजह से चुनाव परिणाम आने के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया जटिल हो सकती है।
भारत और इजरायल की चुनाव प्रणाली में बड़ा अंतर
भारत में लोकसभा चुनाव के दौरान देश को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा जाता है। प्रत्येक क्षेत्र से उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं और सबसे अधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार विजयी होता है। इस प्रणाली को फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट कहा जाता है। इसमें किसी उम्मीदवार के लिए कुल मतों का 50 प्रतिशत से अधिक हासिल करना अनिवार्य नहीं है।
इसके विपरीत, इजरायल में मतदाता मुख्य रूप से राजनीतिक दलों की सूची के पक्ष में मतदान करते हैं और संसदीय सीटें राष्ट्रीय मत प्रतिशत के अनुपात में बांटी जाती हैं। भारत में भी गठबंधन सरकारें बन सकती हैं, लेकिन इजरायल की चुनाव प्रणाली में आनुपातिक प्रतिनिधित्व और 61 सीटों के बहुमत का गणित गठबंधन की भूमिका को विशेष महत्व देता है।
इस प्रकार, इजरायल की चुनाव व्यवस्था में मत प्रतिशत, संसदीय सीटों का अनुपात और राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन सरकार गठन के प्रमुख आधार हैं। यही कारण है कि वहां चुनाव परिणामों के साथ-साथ सरकार बनाने के लिए होने वाली बातचीत पर भी सबकी नजर रहती है।
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