नई दिल्ली। नेपाल के रसुवा क्षेत्र में हाल ही में आई अचानक बाढ़ ने दक्षिण एशिया के वैज्ञानिक समुदाय को चिंता में डाल दिया है। इस प्राकृतिक आपदा के कारणों का पता लगाने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की प्रमुख शाखा, नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (एनआरएससी) ने मोर्चा संभाला है। एनआरएससी के वैज्ञानिकों ने उन्नत सैटेलाइट तकनीक का उपयोग करते हुए इस तबाही का शुरुआती आकलन पेश किया है, जो इस आपदा के पीछे की कड़ियों को स्पष्ट करता है।
तबाही की शुरुआत और भूकंप का झटका
एनआरएससी के विश्लेषण के अनुसार, इस भीषण आपदा की जड़ें तिब्बत के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में छिपी हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि क्षेत्र में आए 4.9 तीव्रता के भूकंप ने इस तबाही के लिए ट्रिगर का काम किया। भारत के भूकंप निगरानी नेटवर्क ने इस भूकंप को सुबह 8:22 बजे दर्ज किया था, जिसका केंद्र जमीन से 10 किलोमीटर नीचे रसुवा इलाके में स्थित था। इस भूकंपीय हलचल के कारण वहां मौजूद ‘सर्क ग्लेशियर’ का एक बड़ा हिस्सा ढह गया। यह हिस्सा बर्फ और चट्टानों के एक विशाल हिमस्खलन में बदल गया, जो बहुत तेज गति से पहाड़ की खड़ी ढलानों से नीचे की ओर बढ़ा।
नदी का रुका रास्ता और अचानक आई बाढ़
पहाड़ों से गिरे इस मलबे और बर्फ ने नीचे बहने वाली नदी के मार्ग को अस्थायी रूप से बाधित कर दिया था। कुछ समय के लिए वहां पानी का एक बड़ा भंडार जमा हो गया, लेकिन जैसे ही यह प्राकृतिक बांध टूटा, पानी, कीचड़ और चट्टानों का एक प्रलयंकारी सैलाब नीचे की ओर बह निकला। इस मलबे और पानी के मिश्रण ने त्रिशूली नदी प्रणाली में प्रवेश किया, जिससे जलस्तर में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। इसी प्रक्रिया ने एक साधारण भूस्खलन को विनाशकारी बाढ़ में बदल दिया, जिसने रास्ते में आने वाली हर चीज को भारी नुकसान पहुँचाया।
इसरो की सैटेलाइट तकनीक से आकलन
हैदराबाद स्थित एनआरएससी ने इस आपदा के प्रभाव को समझने के लिए त्वरित ‘जियोस्पेशियल असेसमेंट’ किया। वैज्ञानिकों ने तबाही से पहले और बाद की स्थितियों की तुलना करने के लिए विभिन्न सैटेलाइटों के डेटा का उपयोग किया। इसमें 24 अगस्त को यूरोपीय सेंटिनल-2 सैटेलाइट द्वारा ली गई तस्वीरों की तुलना 26 अगस्त को इसरो के ‘रिसोर्ससैट-2ए’ से प्राप्त चित्रों से की गई। इसके अलावा, जमीन में आए बदलावों को बारीकी से समझने के लिए 4 अप्रैल 2026 की पुरानी तस्वीरों का भी मिलान किया गया। इस अध्ययन से नदी के मार्ग में आए बड़े बदलावों और मलबे के जमाव वाले क्षेत्रों की सटीक पहचान संभव हो पाई है।
सर्क ग्लेशियर की संवेदनशीलता और भविष्य की चुनौतियां
इस पूरी घटना में सर्क ग्लेशियर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। ये ग्लेशियर पहाड़ों के किनारों पर कटोरे जैसी आकृति में बने होते हैं, जहाँ सालों तक बर्फ जमा रहती है। संतुलन बिगड़ने पर ये बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तिब्बत में हुई इस घटना ने एक चेन रिएक्शन शुरू किया, जिसमें मलबे का खिसकना और फिर जलाशय का फटना शामिल था। वर्तमान में अंतरिक्ष में भारत के 56 सैटेलाइट सक्रिय हैं, जो चक्रवात, बाढ़ और जंगल की आग जैसी आपदाओं की निगरानी कर रहे हैं। नेपाल की यह घटना बताती है कि हिमालयी क्षेत्र में आपदा प्रबंधन के लिए अंतरिक्ष आधारित निगरानी कितनी आवश्यक हो गई है।