चंडीगढ़। सांसद मनीष तिवारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी को लेकर उठ रहे राजनीतिक सवालों और चर्चाओं पर अपनी चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जनहित और क्षेत्र के विकास को उन्होंने हमेशा दलगत राजनीति से ऊपर रखा है। तिवारी के अनुसार, एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि होने के नाते यह उनकी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वे जनता के लाभ से जुड़ी विकास परियोजनाओं का समर्थन करें और उनमें सक्रिय रूप से शामिल हों।
तिवारी ने इंटरनेट मीडिया पर एक विस्तृत बयान जारी कर अपनी स्थिति साफ की। उन्होंने अपने अतीत के अनुभवों का हवाला देते हुए बताया कि 24 अगस्त 2022 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यू चंडीगढ़ में डॉ. होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र (टाटा मेमोरियल सेंटर) का उद्घाटन किया था, तब वे श्री आनंदपुर साहिब क्षेत्र से सांसद थे। उन्होंने कहा कि उस समय भी उनकी मौजूदगी पर कई तरह के सवाल उठाए गए थे, लेकिन आज वह अस्पताल पूरे क्षेत्र के हजारों कैंसर रोगियों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रहा है। तिवारी का मानना है कि स्वास्थ्य और जनसेवा से जुड़े संस्थानों का निर्माण राजनीति का विषय नहीं होना चाहिए।
ताजा घटनाक्रम का जिक्र करते हुए तिवारी ने कहा कि 17 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री ने चंडीगढ़ और उनके पूर्व संसदीय क्षेत्र श्री आनंदपुर साहिब से संबंधित कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। उन्होंने तर्क दिया कि इन परियोजनाओं का सीधा और सकारात्मक प्रभाव आम लोगों के जीवन स्तर पर पड़ेगा। तिवारी ने कहा कि यदि किसी योजना से उनके क्षेत्र की जनता का भला होता है, तो एक सांसद के रूप में वहां उपस्थित रहना और योजना का समर्थन करना उनका प्राथमिक दायित्व है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे विकास कार्यों में अपनी उपस्थिति को केवल सरकारी प्रोटोकॉल नहीं बल्कि जनता के प्रति अपनी जवाबदेही मानते हैं।
राजनीति के बदलते स्वरूप पर चिंता व्यक्त करते हुए मनीष तिवारी ने कहा कि अपने 45 वर्षों के लंबे राजनीतिक सफर में उन्होंने महसूस किया है कि देश की राजनीति का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। उन्होंने कहा कि आज की राजनीति में कटुता और विषैलापन बढ़ गया है। वर्तमान दौर में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को अब वैचारिक विरोधी मानने के बजाय दुश्मन की तरह देखा जाने लगा है। तिवारी ने दिल्ली की वर्तमान राजनीतिक स्थिति को इसका सबसे सटीक उदाहरण बताया, जहां आपसी खींचतान और विरोध के कारण अक्सर विकास कार्य प्रभावित होते हैं।
तिवारी ने अपनी विचारधारा को स्पष्ट करते हुए कहा कि वह आज भी राजनीति के उस “पुरानी परंपरा” के सिद्धांतों में अटूट विश्वास रखते हैं, जहां शिष्टाचार, राजकीय प्रोटोकॉल और राष्ट्र के विकास को निजी या पार्टीगत मतभेदों से कहीं ऊपर रखा जाता था। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि विकास के मुद्दों पर उनकी यह सोच और कार्यशैली भविष्य में भी जारी रहेगी। उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि आलोचक उनके इस दृष्टिकोण के बारे में क्या सोचते हैं, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उनकी प्राथमिकता केवल जनहित और क्षेत्र की प्रगति है।
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