मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर वर्ष 2022 जैसा बड़ा सियासी संकट गहराता नजर आ रहा है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) में एक बड़ी टूट की पटकथा लिखी जा चुकी है। दिल्ली में पार्टी द्वारा विद्रोह को रोकने के लिए बुलाई गई आपातकालीन बैठक में उद्धव ठाकरे को उस समय बड़ा झटका लगा, जब पार्टी के नौ लोकसभा सांसदों में से केवल तीन ही उपस्थित हुए। पार्टी की ओर से सख्त ‘तीन-पंक्ति व्हिप’ जारी किए जाने के बावजूद छह सांसदों ने इस महत्वपूर्ण बैठक से दूरी बनाकर बगावत के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं।
उद्धव ठाकरे के निर्देश पर यह आपातकालीन बैठक गुरुवार सुबह 11 बजे पुराने संसद भवन में बुलाई गई थी। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य पार्टी के भीतर पनप रहे असंतोष को दबाना और सांसदों की एकजुटता सुनिश्चित करना था। हालांकि, बैठक का नजारा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था। बैठक में केवल अनिल देसाई, राजाभाऊ वाजे और अरविंद सावंत ही संजय राउत के साथ नजर आए। निर्धारित समय पर सांसदों की अपेक्षित संख्या न होने के कारण बैठक को स्थगित करना पड़ा।
इस घटनाक्रम के बाद संजय राउत ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि महाराष्ट्र के सांसदों की निष्ठा खरीदने के लिए 15-15 करोड़ रुपये के प्रलोभन दिए जा रहे हैं। राउत ने कहा कि यदि टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों को इस तरह तोड़ा जाता है, तो लोकतंत्र में चुनाव लड़ने का महत्व ही समाप्त हो जाएगा। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि अभी तक पार्टी के पास सांसदों के आधिकारिक रूप से छोड़ने की कोई लिखित जानकारी नहीं है।
बैठक से नदारद रहने वाले सांसदों में नागेश आष्टिकर, संजय देशमुख, संजय जाधव, संजय दीना पाटिल, ओमप्रकाश राजेनिंबालकर और भाऊसाहेब वाकचौरे शामिल हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इन सभी छह बागी सांसदों ने एक पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली मूल शिवसेना में अपने विलय की मांग की है। इस पत्र को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दिया गया है, जहां फिलहाल हस्ताक्षरों के सत्यापन की प्रक्रिया चल रही है।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलबदल विरोधी कानून की पेचीदगियों से बचने के लिए बागियों ने यह सटीक रणनीति अपनाई है। कानून के अनुसार, अयोग्यता से बचने के लिए कुल सांसदों में से कम से कम दो-तिहाई का एक साथ पाला बदलना अनिवार्य है। शिवसेना (यूबीटी) के नौ सांसदों में से छह का अलग होना इस कानूनी आवश्यकता को पूरा करता है।
पार्टी नेतृत्व ने अनुपस्थित रहने वाले सांसदों को चेतावनी दी है कि उनके खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई शुरू की जा सकती है, लेकिन बागी सांसदों के दिल्ली में डेरा डालने और शिंदे गुट के संपर्क में होने से यह स्पष्ट है कि वे पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। यदि यह विलय सफल होता है, तो संसद में उद्धव ठाकरे की पार्टी की ताकत काफी कम हो जाएगी, जबकि एकनाथ शिंदे का गुट दिल्ली में और अधिक मजबूत होकर उभरेगा। फिलहाल महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक इस सियासी उठापटक पर सबकी नजरें टिकी हैं।
बैठक का संक्षिप्त विवरण
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कुल सांसद: 9
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उपस्थित सांसद: 3 (अनिल देसाई, राजाभाऊ वाजे, अरविंद सावंत)
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अनुपस्थित (बागी) सांसद: 6 (नागेश आष्टिकर, संजय देशमुख, संजय जाधव, संजय दीना पाटिल, ओमप्रकाश राजेनिंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे)
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विद्रोह की स्थिति: दो-तिहाई बहुमत के साथ शिंदे गुट में विलय की तैयारी।
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संजय राउत का आरोप: सांसदों की खरीद-फरोख्त के लिए 15 करोड़ रुपये की पेशकश।
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अगला कदम: लोकसभा अध्यक्ष द्वारा हस्ताक्षरों का सत्यापन और विलय पर अंतिम निर्णय।
| उपस्थित नेता | पद/भूमिका |
| संजय राउत | राज्यसभा सांसद और मुख्य प्रवक्ता |
| अनिल देसाई | लोकसभा सांसद |
| राजाभाऊ वाजे | लोकसभा सांसद |
| अरविंद सावंत | लोकसभा सांसद |
इस टूट ने महाराष्ट्र की राजनीति में ‘ऑपरेशन टाइगर’ की सफलता की अटकलों को और तेज कर दिया है, जिससे उद्धव ठाकरे के सामने अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने की एक नई और कठिन चुनौती खड़ी हो गई है।