नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति और देश की संसद में एक अभूतपूर्व घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी सांसदों ने दलबदल विरोधी कानून की तलवार से बचने के लिए एक बेहद सोची-समझी रणनीतिक चाल चली है। इन सांसदों ने न केवल एक गुमनाम राजनीतिक दल ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (एनसीपीआई) की सदस्यता ली है, बल्कि पूरी पार्टी पर ही अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है।
इस पूरे विद्रोह का नेतृत्व कर रहीं ममता बनर्जी की पूर्व करीबी काकोली घोष दस्तीदार को इस नई पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। यह घटनाक्रम ममता बनर्जी के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है क्योंकि काकोली घोष दस्तीदार लंबे समय तक उनके भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल रही हैं।
पार्टी पर कब्जे की सोची-समझी रणनीति
एनसीपीआई जैसी छोटी पार्टी का रातों-रात चर्चा में आना किसी चमत्कार से कम नहीं है। दस्तावेजों के अनुसार, 30 मई को एक गोपनीय समझौते के तहत काकोली घोष दस्तीदार को पार्टी की कमान सौंपी गई। इससे ठीक दो दिन पहले पुरानी अध्यक्ष शेवली कुंडू ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। यह पूरी प्रक्रिया इतनी शांति से पूरी की गई कि किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी। टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर उन्हें जानकारी दी कि उनके पास दो-तिहाई से अधिक बहुमत है। इस बहुमत के आधार पर उन्होंने टीएमसी छोड़कर एनसीपीआई में विलय करने का दावा पेश किया है ताकि उनकी संसद सदस्यता पर कोई आंच न आए।
विद्रोह की मुख्य वजह: अभिषेक बनर्जी का नेतृत्व
पार्टी के भीतर इस बड़ी बगावत का मुख्य कारण ममता बनर्जी के भतीजे और उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी को बताया जा रहा है। विद्रोह में शामिल वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय सहित अन्य नेताओं का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी का कार्य करने का तरीका तानाशाहीपूर्ण और घमंडी है। बागी सांसदों के अनुसार, पार्टी के अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है और केवल अभिषेक बनर्जी की मनमानी चल रही है। इसी नाराजगी ने सांसदों को इतना बड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया।
एनसीपीआई: एक नजर में
पंजीकरण: जनवरी 2023 में चुनाव आयोग में पंजीकृत हुई।
मुख्यालय: पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के सांकराइल में एक साधारण इमारत में स्थित।
चुनावी रिकॉर्ड: 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में 4 उम्मीदवार उतारे, जहां अधिकतम 536 वोट ही मिल सके।
वर्तमान स्थिति: लोकसभा में बागी सांसदों के शामिल होने के बाद यह भाजपा के बाद एनडीए का दूसरा सबसे बड़ा दल बन सकती है।
भाजपा का पर्दे के पीछे से समर्थन
हालांकि भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम पर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा है, लेकिन राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि यह पूरी बिसात भाजपा ने ही बिछाई है। बागी सांसद लगातार पश्चिम बंगाल के नेता सुवेंदु अधिकारी, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और निशिकांत दुबे के संपर्क में थे। बागी सांसदों की कई महत्वपूर्ण बैठकें भूपेंद्र यादव के निवास पर आयोजित की गई थीं। अब इन सांसदों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे एनसीपीआई के बैनर तले भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा बनेंगे और उन्होंने लोकसभा में अपनी अलग बैठने की व्यवस्था की मांग भी की है।
घटनाक्रम के मुख्य बिंदु
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टीएमसी के 28 में से 20 सांसदों ने एक साथ विद्रोह कर दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा पार किया।
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गुमनाम पार्टी एनसीपीआई पर कब्जा कर काकोली घोष दस्तीदार को नया अध्यक्ष बनाया गया।
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बागी गुट ने लोकसभा अध्यक्ष से मिलकर दलबदल विरोधी कानून से सुरक्षा की मांग की।
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6 बार के सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय का बागी गुट में शामिल होना ममता बनर्जी के लिए बड़ी क्षति।
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यदि लोकसभा अध्यक्ष इस विलय को मंजूरी देते हैं, तो एनसीपीआई लोकसभा की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल मचा दी है। एक ऐसी पार्टी जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं था, वह अचानक देश की सत्ता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने की कगार पर खड़ी है। अब सबकी नजरें लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय पर टिकी हैं, जो इन सांसदों के भविष्य और एनसीपीआई की नई हैसियत तय करेंगे।
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