नई दिल्ली। बीजिंग अपनी परमाणु ताकत को और अधिक अभेद्य बनाने के लिए शिनजियांग के सुदूर और वीरान रेगिस्तानी इलाकों में एक अत्यंत गोपनीय और विशाल सैन्य ठिकाने का निर्माण कर रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस खुफिया परियोजना का मुख्य उद्देश्य अमेरिका द्वारा किए जाने वाले किसी भी संभावित पहले परमाणु हमले के प्रभाव को शून्य करना है। चीन चाहता है कि यदि उस पर हमला होता भी है, तो उसके पलटवार करने की क्षमता और लंबी दूरी की परमाणु मिसाइलें हर हाल में सुरक्षित रहें।
हालिया सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से पता चला है कि चीन केवल मिसाइलें ही तैनात नहीं कर रहा, बल्कि वह भूमिगत कुओं (साइलो) के पास लॉन्च पैड, बख्तरबंद बंकरों और आधुनिक संचार केंद्रों का एक जटिल जाल तैयार कर रहा है। यह पूरा निर्माण शिनजियांग के पूर्वी रेगिस्तान में स्थित दो विशिष्ट अष्टकोणीय ठिकानों के इर्द-गिर्द फैला हुआ है। इन अष्टकोणीय ढांचों के भीतर सैनिकों के रहने और सैन्य वाहनों को सुरक्षित रखने की व्यापक व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही इस पूरे क्षेत्र को रेलवे लाइनों और हवाई पट्टियों से जोड़ा गया है, ताकि परमाणु मिसाइल साइलो तक रसद और हथियारों की आपूर्ति निर्बाध रूप से जारी रह सके।
सुरक्षा विश्लेषकों के अनुसार, इस बंजर क्षेत्र में मोबाइल मिसाइल लॉन्चरों और वायु रक्षा प्रणालियों के लिए 80 से अधिक कंक्रीट पैड बनाए गए हैं। साथ ही यहाँ उपग्रह संचार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के लिए आवश्यक उपकरण और इमारतें भी देखी गई हैं। इस निर्माण के विशाल पैमाने ने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के न्यूक्लियर इंफॉर्मेशन प्रोजेक्ट के निदेशक हंस क्रिस्टेंसन का कहना है कि इतने दुर्गम वातावरण में इस स्तर का बुनियादी ढांचा तैयार करना असाधारण है। वहीं हवाई के पैसिफिक फोरम से जुड़े अलेक्जेंडर नील ने बताया कि यह ढांचा हजारों वर्ग किलोमीटर में फैला है, जो चीन के रणनीतिक परमाणु प्रतिरोध को कई गुना शक्तिशाली और विविध बनाने की कोशिश है।
यह सैन्य सक्रियता ऐसे समय में बढ़ी है जब ताइवान की संप्रभुता को लेकर अमेरिका और चीन के बीच तनाव अपने चरम पर है। हाल ही में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को आगाह किया था कि ताइवान के मुद्दे पर अगर सही ढंग से बातचीत नहीं हुई, तो परिस्थितियां खतरनाक मोड़ ले सकती हैं। हालांकि चीन आधिकारिक रूप से ‘पहले परमाणु हमला न करने’ (नो फर्स्ट यूज) की नीति का पालन करने का दावा करता है, लेकिन पश्चिमी विशेषज्ञों का मानना है कि वह अपनी इस परमाणु शक्ति का उपयोग ताइवान मामले में अमेरिकी हस्तक्षेप को रोकने के लिए एक दबाव के रूप में कर सकता है।
चीन की यह रक्षा रणनीति अमेरिका और रूस से काफी अलग नजर आती है। जहाँ अमेरिका और रूस अपने परमाणु साइलो की मजबूती और मिसाइलों की भारी संख्या पर भरोसा करते हैं, वहीं चीन अपने ठिकानों के चारों तरफ सुरक्षा की इतनी परतें बना रहा है जिन्हें भेदना किसी भी विरोधी के लिए लगभग असंभव हो जाए। पेंटागन की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, चीन दुनिया में सबसे तेजी से अपनी परमाणु क्षमताओं का विस्तार कर रहा है और अनुमान है कि साल 2030 तक उसके पास 1,000 से अधिक परमाणु हथियार होंगे। इसके अतिरिक्त, चीन का हुओयान-1 सैटेलाइट सिस्टम किसी भी शत्रु मिसाइल के लॉन्च होने के महज 90 सेकंड के भीतर उसकी पहचान कर सकता है, जो चीन को जवाबी कार्रवाई के लिए तीन से चार मिनट का कीमती समय प्रदान करता है। चीन की यह बढ़ती ताकत वैश्विक शक्ति संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है।
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