नई दिल्ली। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने शुक्रवार को आगामी दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए अपना दूसरा विस्तृत और दीर्घकालिक पूर्वानुमान जारी कर दिया है। विभाग के अनुसार, इस वर्ष देश के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका है, जो कृषि और जल प्रबंधन के लिहाज से चिंता का विषय हो सकता है। इसके साथ ही, मौसम विभाग ने आगाह किया है कि जून की शुरुआत से ही देश के कई राज्यों में लोगों को भीषण लू और अत्यधिक गर्मी का सामना करना पड़ेगा।
मौसम विज्ञान के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बताया कि जून से सितंबर के दौरान पूरे देश में वर्षा का स्तर दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसमें चार प्रतिशत की कमी या बढ़ोत्तरी की गुंजाइश बनी हुई है। क्षेत्रीय पूर्वानुमान के अनुसार, मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत, दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत और मानसून के मुख्य क्षेत्रों में इस बार बादलों की मेहरबानी कम रहेगी और यहां सामान्य से कम बारिश होने के आसार हैं।
जून महीने की स्थिति पर चर्चा करते हुए मौसम विभाग ने बताया कि मानसून की शुरुआत देश के अधिकांश हिस्सों में धीमी रहेगी। हालांकि उत्तर-पश्चिम और पूर्वोत्तर भारत के कुछ चुनिंदा हिस्सों में सामान्य या उससे अधिक बारिश हो सकती है, लेकिन अधिकांश भागों में वर्षा का ग्राफ नीचे ही रहेगा। इसके अतिरिक्त, विभाग ने चेतावनी जारी की है कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार, गुजरात, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में जून के दौरान सामान्य से अधिक दिनों तक भीषण लू चलेगी। इन क्षेत्रों में न केवल दिन का अधिकतम तापमान अधिक रहेगा, बल्कि रात का न्यूनतम तापमान भी सामान्य से ऊपर बना रहेगा, जिससे गर्मी से राहत मिलना मुश्किल होगा।
इस वर्ष भारतीय मानसून पर अल नीनो का खतरा स्पष्ट रूप से मंडरा रहा है। मृत्युंजय महापात्र के अनुसार, प्रशांत महासागर में स्थितियां अब ‘न्यूट्रल’ से बदलकर अल नीनो की ओर तेजी से बढ़ रही हैं। जून तक इसके सक्रिय होने की संभावना 82 प्रतिशत है, जो जुलाई और अगस्त के मुख्य मानसून महीनों के दौरान 90 प्रतिशत से भी अधिक हो सकती है। ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि जब भी अल नीनो सक्रिय होता है, भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है। आंकड़ों के अनुसार, 1972 और 1987 जैसे वर्षों में अल नीनो के कारण देश को गंभीर सूखे का सामना करना पड़ा था। चिंताजनक बात यह है कि जनवरी 2026 से अब तक मध्य प्रशांत महासागर के तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है, जो इस सदी का सबसे तेज़ वार्मिंग ट्रेंड है।
वर्तमान स्थिति की बात करें तो मानसून ने अपनी सामान्य तारीख से चार दिन पहले यानी 16 मई को ही अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में दस्तक दे दी थी। फिलहाल यह अरब सागर और लक्षद्वीप तक पहुंच चुका है और अगले एक सप्ताह में इसके केरल और पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंचने के लिए परिस्थितियां अनुकूल बनी हुई हैं। हालांकि, उत्तर-पश्चिम भारत के लिए एक संक्षिप्त राहत भरी खबर यह है कि आगामी तीन दिनों में पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से कुछ इलाकों में गरज-चमक के साथ बारिश और ओलावृष्टि हो सकती है, जिससे तापमान में कुछ समय के लिए गिरावट आएगी।
मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अभी भी भीषण गर्मी का दौर जारी है, जहां खजुराहो में पारा 46 डिग्री के पार पहुंच गया है। मौसम विभाग का यह नया पूर्वानुमान स्पष्ट करता है कि भारत को इस बार कम बारिश और अत्यधिक गर्मी की दोहरी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। मानसून के कमजोर रहने की संभावना ने कृषि क्षेत्र के लिए रणनीतियों को नए सिरे से तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया है।
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