नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने जजों के खिलाफ आधारहीन और लापरवाह आरोप लगाने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक वकील के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी मर्यादा की रक्षा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अनिवार्य है। जजों पर लगाए जाने वाले बेबुनियाद आरोप न्यायिक स्वतंत्रता की नींव पर प्रहार करते हैं, जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
यह मामला एक वकील से जुड़ा है जिसने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक कार्यरत जज पर कई संगीन आरोप लगाए थे। इन आरोपों में यह दावा भी शामिल था कि संबंधित न्यायाधीश का झुकाव एक विशेष राजनीतिक दल की ओर है। वकील की इन दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि यदि इस प्रकार के आरोपों को बिना किसी प्रमाण के प्रसारित होने दिया गया, तो इससे न्याय व्यवस्था पर जनता के विश्वास को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। अदालत ने माना कि वकील का सार्वजनिक रूप से और प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर जज पर निशाना साधना एक गंभीर कृत्य है।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि संवैधानिक लोकतंत्र में जवाबदेही और जांच-पड़ताल महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी न्यायाधीश की व्यक्तिगत ईमानदारी पर सवाल उठाने के लिए पुख्ता साक्ष्य होने चाहिए। पीठ ने कहा कि किसी जज के खिलाफ निजी प्रकृति के आरोप केवल कानून की निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही लगाए जाने चाहिए। यदि बिना तथ्यों के व्यक्तिगत टिप्पणी की जाती है, तो यह पूरी न्यायिक बुनियाद को कमजोर करने का जोखिम पैदा करती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक फैसलों की निष्पक्ष और नेकनीयत से की गई आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है और हर वादी को उच्च अदालतों में फैसलों को चुनौती देने का अधिकार है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि फैसलों को चुनौती देना और न्यायाधीश की निष्पक्षता पर परोक्ष रूप से कीचड़ उछालना, दो अलग-अलग बातें हैं। अदालत ने कहा कि किसी भी कानूनी चुनौती की वैधता इस बात पर टिकी होती है कि फैसले की आलोचना कितनी संयमित और सभ्य है। शिकायत को निजी बनाकर न्यायाधीश की सत्यनिष्ठा पर प्रहार करना पूरी तरह गलत है। बेंच ने अंत में दोहराया कि न्यायिक प्रक्रिया को व्यक्तिगत शिकायतों का अखाड़ा नहीं बनाया जा सकता और जजों के प्रति सार्वजनिक अपमानजनक व्यवहार को हल्के में नहीं लिया जाएगा। इसी के साथ अदालत ने वकील के खिलाफ अवमानना की प्रक्रिया को जारी रखने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
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