Uttarakhand: देवभूमि के आध्यात्मिक गौरव और देवतत्व को संवारने में जुटी धामी सरकार

देहरादून। उत्तराखंड की पावन धरती प्राचीन काल से ही धर्म, अध्यात्म और संस्कृति का संगम रही है। गंगा, यमुना, चारधाम, आदि कैलाश और अनेक शक्तिपीठों की उपस्थिति के कारण इसे दुनिया भर के सनातन धर्मावलंबियों की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इसी आध्यात्मिक विरासत और ‘देवतत्व’ को सुरक्षित रखने के साथ-साथ उसे आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप संवारने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी निरंतर प्रयासरत हैं। राज्य सरकार का मानना है कि उत्तराखंड की असली पहचान इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों में निहित है, और इनका संरक्षण न केवल श्रद्धा का विषय है, बल्कि यह प्रदेश की आर्थिक और सामाजिक उन्नति का भी मुख्य आधार है।

इसी संकल्प को साकार करने की दिशा में राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में धार्मिक और सांस्कृतिक परियोजनाओं के लिए उदारतापूर्वक प्रावधान किए हैं। सरकार का लक्ष्य उत्तराखंड को वैश्विक स्तर पर धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन के सबसे बड़े केंद्र के रूप में स्थापित करना है। इससे न केवल तीर्थाटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि राज्य की आर्थिक गतिविधियों में भी व्यापक तेजी आने की संभावना है।

कुंभ और गंगा कॉरिडोर के लिए बड़ा बजट आवंटन
धार्मिक आयोजनों की दृष्टि से हरिद्वार कुंभ का महत्व वैश्विक है। आगामी हरिद्वार कुंभ मेले की तैयारियों को भव्य और व्यवस्थित बनाने के लिए पुष्कर सिंह धामी सरकार ने बजट में एक हजार करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान किया है। सरकार की मंशा है कि कुंभ के दौरान आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को विश्व स्तरीय सुविधाएं मिलें और देवभूमि की मर्यादा के अनुरूप इस महापर्व का आयोजन हो।

इसके साथ ही, हरिद्वार और ऋषिकेश के धार्मिक महत्व को और अधिक विस्तार देने के लिए ‘हरिद्वार-ऋषिकेश गंगा कॉरिडोर’ परियोजना पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए पूंजीगत निवेश के अंतर्गत राज्यों को विशेष सहायता योजना के तहत दो हजार करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। यह कॉरिडोर न केवल गंगा के तटों को सुंदर बनाएगा, बल्कि श्रद्धालुओं के आवागमन और पूजा-अर्चना को भी अधिक सुगम बनाएगा।

नंदा देवी राजजात और शीतकालीन यात्रा को प्रोत्साहन
उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक ‘नंदा देवी राजजात’ के सफल और भव्य आयोजन के लिए सरकार ने बजट में 25 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। यह आयोजन राज्य की लोक संस्कृति और अगाध श्रद्धा का परिचायक है। इसके अलावा, सरकार ने तीर्थाटन को केवल गर्मियों के महीनों तक सीमित न रखकर उसे पूरे वर्ष संचालित करने के उद्देश्य से ‘शीतकालीन यात्रा’ की शुरुआत पहले ही कर दी है। इससे स्थानीय पर्यटन व्यवसायियों को पूरे साल रोजगार के अवसर मिलेंगे और श्रद्धालुओं को भी अलग मौसम में देवभूमि के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होगा।

मानसखंड मंदिर माला और अवस्थापना विकास
गढ़वाल के साथ-साथ कुमाऊं क्षेत्र के धार्मिक स्थलों के विकास के लिए सरकार ‘मानसखंड मंदिर माला’ मिशन पर तेजी से काम कर रही है। इस योजना के तहत पहले चरण में 48 प्रमुख मंदिरों की पहचान की गई है, जिनके आसपास बुनियादी सुविधाओं और अवस्थापना विकास के कार्य प्रारंभ हो चुके हैं। इसके साथ ही, बद्रीनाथ और केदारनाथ पुनर्निर्माण परियोजनाएं भी सरकार की प्राथमिकता में शामिल हैं, जो अब अपने अंतिम चरणों की ओर बढ़ रही हैं। इन परियोजनाओं का उद्देश्य तीर्थयात्रियों को आधुनिक सुविधाएं प्रदान करना और हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए विकास करना है।

नदियों के तटों का सौंदर्यीकरण और रिवर फ्रंट योजनाएं
धामी सरकार जल निकायों और पवित्र नदियों की महत्ता को समझते हुए रिवर फ्रंट परियोजनाओं पर भी निवेश कर रही है। इसी क्रम में सरयू रिवर फ्रंट योजना और अन्य नदी तट विकास योजनाओं के लिए बजट का प्रावधान किया गया है। यमुना नदी के तट पर स्थित हरिपुर कालसी में भव्य यमुना घाट के निर्माण के लिए भी धन आवंटित किया गया है। ये घाट न केवल धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उपयुक्त होंगे, बल्कि पर्यटन की दृष्टि से भी आकर्षक केंद्र बनेंगे।

आध्यात्मिक अर्थव्यवस्था और संस्कृत शिक्षा पर जोर
राज्य की आर्थिक मजबूती के लिए सरकार ने एक नया दृष्टिकोण अपनाते हुए ‘स्प्रिचुअल इकोनॉमी जोन’ (आध्यात्मिक अर्थव्यवस्था क्षेत्र) की परिकल्पना की है। इसके लिए प्रारंभिक तौर पर 10 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य अध्यात्म और आधुनिक अर्थव्यवस्था के बीच एक सेतु बनाना है, जिससे स्थानीय उत्पादों और सेवाओं को धार्मिक पर्यटन के माध्यम से वैश्विक पहचान मिल सके।

इसके अतिरिक्त, देवभूमि की प्राचीन भाषा और ज्ञान परंपरा को जीवित रखने के लिए भी सरकार ने ठोस कदम उठाए हैं। राज्य की संस्कृत पाठशालाओं को मजबूती प्रदान करने और उनके संचालन के लिए 28 करोड़ रुपये के अनुदान की व्यवस्था की गई है। सरकार का मानना है कि जब तक हमारी भाषा और संस्कार सुरक्षित रहेंगे, तभी तक उत्तराखंड का ‘देवतत्व’ बना रहेगा।

पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार जिस प्रकार धार्मिक और सांस्कृतिक विरासतों के संरक्षण और संवर्धन पर जोर दे रही है, उससे स्पष्ट है कि आने वाले समय में उत्तराखंड न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व के लिए शांति और अध्यात्म का सबसे बड़ा गंतव्य बनकर उभरेगा। इन योजनाओं के सफल क्रियान्वयन से स्थानीय युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और प्रदेश की संस्कृति का ध्वज पूरी दुनिया में गर्व के साथ लहराएगा।

 

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